13 दिसंबर 2012
ibnkhabar
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नई दिल्ली। साल 2012 अलविदा कहने को है। ये साल कई खास वजहों से याद किया जाएगा। खास तौर पर राजनीति और देश की धड़कन बने क्रिकेट में आए उतार-चढ़ाव ने इस साल को यादगार बना दिया है। खास बात ये भी है कि ये धुरी एम फैक्टर के आसपास घूमती है। राजनीति और क्रिकेट में एम से शुरू होने वाले नाम की शख्सियतें देश में चर्चा का विषय बन गई हैं। अब इनके भविष्य पर कयास लग रहे हैं।
देश का ‘एम’ फैक्टर
मौजूदा वक्त में देश में चर्चा का विषय बने हुए हैं मोदी, माया, मनमोहन और माही। इन्हीं शख्सियतों ने पिछले कुछ वक्त से अपनी उपलब्धियों, मौजूदा स्थिति और भविष्य से जुड़ी चर्चाओं को आसमान पर पहुंचा दिया है। आज ये सभी एक ऐसे मोड़ पर आ खड़े हुए हैं, जहां इनकी शख्सियत ही दांव पर लगी हुई है। एक तरह से इनके लिए फैसले का वक्त आ चुका है। अगर ये अपनी-अपनी चुनौतियों से पार हो गए तो नई बुलंदियां हासिल करेंगे, अगर नाकाम रहे तो इनका सितारा डूबने में देर नहीं लगेगी। गौर करते हैं इन शख्सियतों और उनसे जुड़े तथ्यों पर जो इनके लिए चुनौती बनी हुई हैं।
क्या मोदी फिर दोहराएंगे करिश्मा?
मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए गुजरात विधानसभा चुनाव आर-पार की लड़ाई बन चुका है। साल 2001 में गुजरात भेजे गए मोदी अपने दम पर बीजेपी को लगातार दो बार 2002 और 2007 में जिता चुके हैं। 2007 में मोदी ने बीजेपी को 182 में से 117 सीटें दिलाईं। अपने करिश्मे की बदौलत ही उन्हें बीजेपी की ओर से भावी पीएम भी बताया जा रहा है। लेकिन इस बार मोदी के लिए हालात आसान नहीं हैं। पिछले 10 साल में पहली बार गुजरात में हिंदुत्व का मुद्दा नदारद है, बात विकास की हो रही है। इस बार मोदी विरोध के सुर भी सुनाई पड़ रहे हैं।
जाहिर है मोदी के लिए ये फैसले की घड़ी है। अगर मोदी गुजरात में दोबारा बीजेपी को सत्ता दिलाते हैं तो उनकी ताकत में इजाफा होगा और वो पीएम पद पर उनकी दावेदारी और मजबूत हो जाएगी। लेकिन अगर बीजेपी को अपेक्षित कामयाबी नहीं मिलती, या उम्मीद से कम सीटों पर सिमट जाती है तो मोदी को अपना किला छोड़ना पड़ सकता है। ऐसे में उन्हें दिल्ली का रुख करना पड़ सकता है। गुजरात में एकछत्र राज कर रहे मोदी के लिए दिल्ली की राजनीति में खुद को एडजस्ट कर पाना आसान नहीं होगा। कुल मिलाकर गुजरात चुनाव के नतीजे मोदी की किस्मत का फैसला करेंगे।
क्या माया दे पाएंगी मुलायम को चुनौती?
माया – मोदी की ही तरह बीएसपी अध्यक्ष मायावती के लिए भी ये फैसले का वक्त है। 2012 माया के लिए किसी बुरे सपने से कम साबित नहीं हुआ। यूपी विधानसभा चुनाव में उन्हें एसपी से करारी हार खानी पड़ी। 2007 के विधानसभा चुनाव में बीएसपी को 206 सीटें मिली थीं, लेकिन 2012 में वो महज 79 सीटों पर सिमट गईं। करारी मात खाने के बाद मायावती ने दिल्ली का रुख कर लिया। माया-मुलायम की सियासी अदावत जगजाहिर है, लेकिन दोनों ने केंद्र सरकार को बाहर से समर्थन दिया। लेकिन कुछ मुद्दों पर दोनों का रुख एकदम उलट है।
सरकारी नौकरी में प्रमोशन में आरक्षण बिल को लेकर माया-मुलायम विपरीत ध्रुव पर खड़े हैं। जहां माया हर हाल में इसी सत्र में बिल पास करवाना चाहती हैं, वहीं मुलायम इसे किसी भी हाल में पास होने नहीं देना चाहते। माया ने राज्यसभा में एफडीआई पर सरकार को समर्थन देकर उसकी नाक बचाई और बदले में प्रमोशन बिल पर समर्थन की भी आस रखी। लेकिन मुलायम के जबरदस्त विरोध ने माया का गणित बिगाड़ दिया है। अब माया के सामने आर-पार की लड़ाई है। माया की नजर 2014 लोकसभा चुनाव पर है। अगर प्रमोशन में आरक्षण बिल पास हो जाता तो माया बुलंद हौसलों के साथ अपने वोटरों के पास जा सकती थीं। लेकिन ऐसा ना होने पर माया का खेल बिगड़ सकता है।
क्या बच पाएगी मनमोहन की साख?
लगातार दो बार प्रधानमंत्री पद संभालने वाले डॉ. मनमोहन सिंह देश में आर्थिक सुधार के सूत्रधार माने जाते हैं। मनमोहन का ये आखिरी कार्यकाल है। उन्होंने पहली बार 72 साल की उम्र में 22 मई 2004 से प्रधानमंत्री पद संभाला था, जो अप्रैल 2009 तक चला। इसके बाद 2009 में हुए लोकसभा के चुनाव के बाद मनमोहन ने एक बार फिर यूपीए सरकार की कमान संभाली। देश में आर्थिक उदारीकरण का श्रेय मनमोहन सिंह को ही जाता है, लेकिन इन्ही आर्थिक सुधारों ने मनमोहन के लिए चुनौतियां भी पेश कर दी हैं। दूसरे कार्यकाल में मनमोहन के फैसलों का विरोध हो रहा है। ना सिर्फ विपक्ष, बल्कि आम जनता भी फैसलों को लेकर मनमोहन से रूठी नजर आ रही है।
बढ़ती महंगाई, पेट्रोल के दाम नियंत्रित करने का अधिकार निजी कंपनियों को सौंपना, गैस सिलेंडर की सब्सिडी में कटौती और एफडीआई लागू करने के फैसले ने विरोध का वो दौर शुरू कर दिया, जो फिलहाल थमता नहीं दिख रहा है। 2014 के चुनाव के बाद मनमोहन सम्मान के साथ विदाई चाहेंगे। कांग्रेस भी चाहेगी कि मनमोहन की साख बरकरार रहे और उन्हें ऐसे नेता के तौर पर याद किया जाए जिसने देश को विकास की राह दिखाई। ऐसे में मनमोहन के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी साख को बचाने की होगी। क्या मनमोहन इसमें कामयाब रहेंगे, ये बड़ा सवाल है।
क्या संकट से निकल पाएंगे माही?
टीम इंडिया के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी जिन्हें प्यार से माही भी कहा जाता है, अपने करियर की शुरुआत से कामयाबी के रथ पर सवार रहे। धोनी ने अपने वनडे करियर की शुरुआत 2004 में बांग्लादेश के खिलाफ की। 2007 में उन्हें टी-20 के लिए टीम की कप्तानी सौंपी गई और उन्होंने खिताब जिताकर सभी को चौंका दिया। जल्द ही उन्हें वनडे की भी कप्तानी मिल गई। धोनी ने अपनी कप्तानी में टीम इंडिया को बुलंदियों पर पहुंचा दिया। उनकी कप्तानी में ही टीम इंडिया ने 2008 में ऑस्ट्रेलिया में पहली बार ट्राएंगुलर सीरीज जीती। 2009 में 27 साल बाद न्यूजीलैंड को उसके ही घर में हराया। 2011 में टीम इंडिया नंबर वन टेस्ट टीम भी बनाया। घरेलू मैदान पर आईपीएल की टीम चेन्नई सुपरकिंग्स की कामयाबी ने भी साबित किया कि माही मिट्टी भी छू लें तो वो सोना बन जाती है। लेकिन साल 2012 जैसे धोनी के लिए बुरा सपना साबित हुआ।
ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के दौरे में मिली हार ने माही को नकारात्मक वजहों के लिए सुर्खियों में ला दिया। पहले सहवाग के साथ उनके मनमुटाव ने सुर्खियां बटोरी, फिर धोनी की कप्तानी पर सवाल उठाने वाले चयनकर्ता मोहिंदर अमरनाथ की छुट्टी होने पर उंगलियां माही पर उठीं। अब इंग्लैंड के खिलाफ घरेलू जमीन पर मिल रही हार ने भी धोनी को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया। गौतम गंभीर से मनमुटाव की भी खबरें आ रही हैं। लगातार हार के बीच टीम बिखराव की ओर बढ़ती दिख रही है। कभी माही टीम को एकजुट रखने वाले कप्तान के तौर पर जाने जाते थे, लेकिन अब उनकी पहचान एक जिद्दी क्रिकेटर के रूप में होने लगी है। अब धोनी के सामने चुनौतियों का अंबार लगा है। उन्हें ना सिर्फ टीम को एकजुट रखना है बल्कि टीम को जीत की राह पर भी वापस लाना है। उनके विरोधियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। श्रीनिवासन के भरोसे कब तक वो कप्तान बने रहेंगे इसका जवाब उन्हें जल्द ढूंढ़ना होगा।
ये वो चार नाम हैं जिन पर पूरे देश की निगाहें लगी हैं। सभी ने कामयाबी का सुनहरा दौर देखा है। लेकिन आगे की राह कांटों भरी है। अगर ये इन चुनौतियों से निकल गए तो तपे हुए सोने की मानिंद चमक उठेंगे। लेकिन चुनौतियां भारी पड़ गईं तो इनकी रोशनी मद्धिम पड़ने में देर नहीं लगेगी। साल 2012 खत्म होने को है। 2013 में वक्त नई करवट लेगा और तय करेगा कि मोदी, माया, मनमोहन, माही का भविष्य क्या है।
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