08 नवंबर 2012
आईएएनएस
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राजकोट/अमरेली। गुजरात विधानसभा के पहले चरण में 13 दिसम्बर को जिन सीटों पर मतदान होना है, उनमें सौराष्ट्र की 52 सीटें भी शामिल हैं। इनमें कम से कम आधी सीटें ऐसी हैं जहां के किसान अपने खेत-खलिहानों में पानी के लिए राजनीतिक दलों की बजाय भगवान का आसरा लगाए बैठे हैं। क्षेत्र के ग्रामीण अंचलों में सिंचाई का पानी एक बड़ी समस्या के रूप में उभरी है। यह समस्या यहां चल रहे सत्ता के महाभारत में बड़ी भूमिका निभा सकती है।
मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के विकास के लाख दावों के बावजूद यह क्षेत्र सूखे की समस्या से निजात नहीं पा सका है। यहां के बांधों में पानी बस इतना है कि शौच का प्रबंध हो जाए और नहरें इस कदर सूख गई हैं कि उस पर कंटीली झाड़ियां और नागफनी उग आए हैं।
मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने विधानसभा के पिछले चुनाव में क्षेत्र की जनता से वादा किया था कि वे यहां नर्मदा का पानी पहुंचाएंगे और लोगों के खेतों की प्यास बुझाएंगे। लेकिन वह इसमें असफल रहे।
मोदी ने इस समस्या के समाधान के लिये प्रयास भी किए। पानी को रोकने के लिए नदी और तालाबों में जगह-जगह सरकारी स्तर पर चेक डैम बनाए गए, परन्तु पानी न होने के कारण सब के सब सून हैं। कुछ नदियां तो ऐसी है, जिन्हें 12 महीने पानी नसीब नहीं होता। भादर नदी तो पूरी तरह सूख चुकी है। ऐसे में यहां के किसान गर्मी हो या बरसात, आसमान और भगवान की ओर टकटकी लगाए रहते हैं।
अमरेली जिले के किसान मनसुख भाई पहले तो कहते हैं, हमें तो भगवान से ही आसरा रह गया है। वही हमारा सहारा है। इसलिए हमारी निगाहें हमेशा आसमान में रहती हैं।
बातचीत का सिलसिला जारी रखने पर वह खुलते हैं और स्पष्ट कहते हैं, पानी के बगैर हमारे खेत सूखे पड़े हैं और मजबूरी में हमें कपास की खेती करनी पड़ रही है। शुक्र है बप्पा का, जिनके कारण हमें पीने का पानी नसीब हुआ है। बप्पा ने कहा है कि वह खेती के लिए पानी की व्यवस्था हर हाल में करेंगे।
ज्ञात हो कि प्रदेश का मुख्यमंत्री रहते हुए बप्पा के नाम से मशहूर केशुभाई पटेल ने पूरे सौराष्ट्र क्षेत्र में पाइपलाइन के जरिये नर्मदा का पानी पहुंचाया था। आज भी लोग घंटों बाल्टी-दर बाल्टी पीने का पानी भरते रहते हैं, लेकिन आज भी उनकी खेतों को पानी का इंतजार है।
गोंडल विधानसभा के गांव श्रीनाथगढ़ के दिलीप पटेल कहते हैं, सौराष्ट्र का किसान पानी चाहता है। मोदी ने पानी का वादा किया था लेकिन वह हमारी समस्या का समाधान नहीं कर पाए। जो हमारी खेतों में पानी पहुंचाएगा हम उसे अपना मत देंगे। दिलचस्प यह है कि भाजपा ने जहां अपने चुनावी घोषणा पत्र में सिंचाईं पर करोड़ों रुपये खर्च करने का वादा किया है, वहीं केशुभाई के नेतृत्व वाली गुजरात परिवर्तन पार्टी (जीपीपी) ने भी सत्ता में आने पर खेत-खेलिहानों तक पानी पहुंचाने की दावा किया है।
इस चुनावी बयार में अधिकतर खेडूत (किसान) इस सोच के हैं कि वे इलाके में नर्मदा जल लाने वाले को ही अपना मत देंगे। सौराष्ट्र के ग्रामीण अंचलों में पानी की कमी और सूखे की समस्या इस कदर है कि अमरेली से विधायक व मोदी सरकार में कृषि मंत्री दिलीप भाई संघाणी की चुनावी नैया भी सूखे के चपेट में फंसी दिख रही है।
राहुल गांधी की टीम में शामिल कांग्रेस के परेश धनानी उन्हें कड़ी चुनौती दे रहे हैं। मौजूदा परिस्थिति मतदान के दिन तक यदि नहीं बदली तो संघाणी का आसरा भी भगवान ही होंगे। संघाणी समर्थक कहते हैं, पानी की समस्या के समाधान की कोशिश हमने की है, लेकिन कुदरत की मार को कौन रोक सकता है। इसके बावजूद हमने क्षेत्र को बदहाल होने से बचाया और लोगों को रोजगार के रूप में इसका विकल्प दिया। कुछ जगहों पर यह समस्या जरूर है लेकिन पूरे सौराष्ट्र को इससे नहीं जोड़ा जा सकता। अमरेली हो या भावनगर, जूनागढ़ हो या राजकोट। यहां के ग्रामीण इलाकों में इस बार खेडूत पानी और सूखे की समस्या का समाधान पाने के लिए अड़े हैं।
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