19 अगस्त 2012
शकील अहमद
हिंदी इन डॉट कॉम
मुम्बई। आखिर ऐसा क्या हुआ कि दुनिया भर को अपने असर से दीवाना और मदहोश बनानेवाले सोशल मीडिया ने, संचार के माध्यम एसएमएस-एमएमएस ने अचानक भारत में एक कुरूप चेहरा ओढ़ लिया और सरकार को इनके खिलाफ कड़े कदम तक उठाने पढ़े।
सोशल मीडिया और संचार माध्यम जिस तरह से हिंसक घटनाओं के समाचार, क्लिप, तस्वीरें और ऑडियो और वीडियो फैला रहे हैं उससे लोगों के दिलों कई तरह से दहशत बढ़ रही है। कहीं इनकी वजह से लोगों का गुस्सा बढ़ रहा है, कहीं गुस्से को बल मिल रहा है, कहीं डर का माहौल पैदा हो रहा है।
बेंगलूरु में एक विशेष समुदाय की मंशा को आधार बनाकर एसएमएस के जरिये फैलाए जा रहे संदेश को इतनी गंभीरता से लिया गया है कि सिर्फ 4-5 दिनों 30 हजार लोग पलायन कर बैठे। बेंगलूरु के पलायन ने देश के दूसरे शहरों के लिए मिसाल पेश की और हैदराबाद, मुम्बई, पुणे, वडोदरा भी इस भेड़चाल में शामिल हो गए।
असम में पिछले महीने से जारी साम्प्रदायिकता की आग ने सारे देश को अपनी गिरफ्त में ले लिया है।
कहते हैं कि जंगल की आग बहुत तेजी से फैलती है और जंगल के ताने-बाने यानी पेड़-पौधों को तबाह कर के रख देती है। ऐसा ही कुछ सोशल मीडिया और एसएमएस के जरिए देश में हो रहा है। एक एमएमएस एक सम्प्रदाय को दूसरे सम्प्रदाय के खिलाफ खड़ा कर देता है, तो दूसरा एसएमएस एक दूसरे सम्प्रदाय को एक शहर से अपने राज्य की ओर पलायन करने के लिए मजबूर कर देता है। असमिया लोगों के बीच फैली इस दहशत ने को मुखर किया है मुम्बई में असम के दंगों के खिलाफ हुए प्रदर्शन में हिंसा की घटना, लखनऊ में हिंसक प्रदर्शन, पुणे में प्रदर्शन।
इस तरह की हिंसक प्रदर्शनों ने देश भर में रह रहे असमिया और पूर्वोत्तर के लोगों के बीच डर पैदा कर दिया है कि आनेवाले दिनों में उनके खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी और उन्हें खदेड़ दिया जाएगा। इसलिए ये लोग अपने राज्य लौट जाना ही बेहतर समझते हैं।
लेकिन अफसोस यह है कि सरकार, प्रशासन, पुलिस और कई सामाजिक व धार्मिक संगठनों के दिलासों के बावजूद बेंगलूरु से तो उनका पलायन रुका नहीं; दूसरे हैदराबाद, मुम्बई, पुणे और वडोदरा जैसे शहरों में भी शुरू हो गया।
बेंगलूरु के कई मुस्लिम संगठनों और नागरिकों ने खुद सामने आकर असमियों को अपने यहां ईद पर आने का न्योता दिया है और विश्वास दिलाया है कि उनकी पूरी तरह से हिफाजत की जाएगी और उन पर आंच नहीं आने दी जाएगी। पर दिल में बैठे डर को कैसे हटाए जाए। वैसे तो कोई तरकीब काम नहीं आ रही है, लेकिन प्रशासन ने इसकी जड़ पर ही नियंत्रण रखने पर विचार किया। इसलिए केंद्र सरकार ने 15 दिनों के लिए बल्क एसएमएस और एमएमएस पर रोक लगा दी। सोशल मीडिया फेसबुक और ट्विटर पर कड़ी निगरानी रखने का आदेश दिया गया। गोवा में एक खास किस्म के वीडियो क्लिप पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, ताकि हालात न बिगड़ें।
अब सवाल यह उठता है कि ऐसा क्यों हुआ कि एक राज्य में फैली हिंसा ने दूसरे राज्यों के मुसलमानों को उकसाया? ऐसा तो पहले भी हुआ कि एक राज्य में हिंसा होती है और वहीं दबकर रह जाती है। मुम्बई में हुई दंगे हों या गुजरात में हुए दंगे, उनका फैलाव नहीं और न ही उनके खिलाफ जगह-जगह विरोध प्रदर्शन हुए और हिंसा के खिलाफ हिंसक प्रदर्शन तो कतई नहीं हुए। तो अब ऐसा क्या हुआ कि असम में हुई हिंसा का असर सारे देश में फैलता नजर आ रहा है। इसके पीछे सोशल मीडिया ने एक खलनायक की तरह भूमिका निभाई है। सही है कि कहीं भी और किसी भी समुदाय के खिलाफ होनेवाली हिंसा और अत्याचार को आवाज दी जानी चाहिए, फिर बर्मा में मुसलमानों पर होनेवाला जुल्म ही क्यों न हो और पाकिस्तान में हिंदुओं पर होनेवाली ज्यादती और अत्याचार ही क्यों न हो! हिंसा के खिलाफ आवाज तो उठनी चाहिए यह इंसानियत का तकाजा है। तकाजा तो यह भी कहता है कि पाकिस्तान में होनेवाले हिंदुओं के अत्याचार के खिलाफ भारतीय मुसलमानों की आवाज भी उठे और बर्मा में मुसलमानों पर होनेवाले अत्याचार पर भारतीय हिंदुओं की आवाज भी उठे। अपने-अपने दायरों और अपने-अपने स्वार्थों के बीच कैद होकर कोई भी समाज आगे नहीं बढ़ सकता।
दूसरी ओर, देश की संसद में भी इस पर बहस हो रही है और दिलचस्प बात यह है कि असम हिंसा के दोनों पहलू अपनी-अपनी बात पर अड़े हुए हैं। मुसलमानों को लगता है कि असम में उन पर अत्याचार हो रहा है इसलिए देश भर में उसके खिलाफ प्रदर्शन जारी हैं। लेकिन उधर बीजेपी यह राग आलाप रही है कि असम में हुई हिंसा से स्थानीय लोगों को नुकसान हुआ है और बांग्लादेशियों का इसमें हाथ है।
कई हिंदू संगठनों ने भी असम हिंसा में बांग्लादेश का नाम लिया है। तो फिर हमारी सरकार चुप क्यों है? दंगों के बाद मुआवजा देना भर ही तो सरकार का काम नहीं है? या फिर दंगों को रोकने के लिए एसएमएस पर पाबंदी लगाना तो कोई समाधान नहीं है? सरकार को चाहिए कि वह दंगों की जड़ों तक पहुंचे और दोषियों को सजा दे और इसे राजनीति का मुद्दा न बनाते हुए इसका हल निकाले।
असम हिंसा के बाद फैली हिंसा और अफवाहों से जुड़ी खबरें यहां पढ़ें...
‘बल्क SMS-MMS’ पर रोक, फेसबुक-ट्विटर पर कड़ी नजर
सरकार ने अफवाहों को रोकने के लिए कड़ा कदम उठाते हुए बल्क एसएमएस और एमएमएस पर भी रोक लगा दी है।
असमियों के पलायन पर संसद में बरपा हंगामा
नॉर्थ ईस्ट के छात्रों के पलायन की गूंज के बीच लोकसभा में प्रधानमंत्री ने देश को भरोसा दिलाया कि वे किसी कीमत पर नॉर्थ ईस्ट के लोगों को सुरक्षा देंगे।
असम की आग अब लखनऊ पहुंची, प्रदर्शन हुआ हिंसक
लखनऊ में असम हिंसा के विरोध में मुस्लिम संगठनों द्वारा शुक्रवार को निकाला गया जुलूस हिंसक हो गया।
गुजरात तो नहीं पहुंची अफवाहें, पर असमियों का पलायन शुरू
पलायन करने वालों का कहना है कि वडोदरा में उन्हें किसी तरह की धमकी नहीं मिली है।
दिलासे काम नहीं आए, बेंगलूरु से असमियों का पलायन जारी
सोनिया गांधी, सुशील कुमार शिंदे और जगदीश शेट्टार के आश्वासनों के बावजूद बेंगलूरु से पूर्वोत्तर के लोगों का पलायन जारी है।
अफवाहों से हिला देश, असम से बैंग्लुरु तक अफरा-तफरी
असमिया लोगों पर हमला होने की अफवाहें बेंगलूरु से अब हैदराबाद पहुंच गई हैं और वहां भी उत्तर पूर्व के लोगों का पलायन शुरू हो गया है।
असम में फिर हिंसा का दौर, बेकाबू भीड़ पर गोलीबारी
ताजा हिंसा असम के बक्शा और कामरूप जिलों में हुई है, जहां बसों आग के हवाले कर दिया गया है।
मुम्बई हिंसा में 23 के खिलाफ मामला दर्ज
23 लोगों के खिलाफ हत्या, हत्या का प्रयास, छेड़छाड़ और सार्वजनिक सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाने का मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी।
असम में हिंसा जारी, 40 की मौत, राजनीति हुई तेज
असम के कोकराझार और चिरांग जिलों में पिछले एक सप्ताह से जारी हिंसा में बुधवार को भी कोई कमी नहीं आई।
आपकी राय: देश में फैल रही असम हिंसा की आग के लिए कौन जिम्मेदार?
आपकी राय में असम हिंसा के लिए कौन लोग जिम्मेदार हैं?
असम हिंसा के बाद देश के कई हिस्सों में फैली अफवाहों से जुड़ी तमाम खबरें:
असम की आग अब लखनऊ पहुंची, प्रदर्शन हुआ हिंसक
‘बल्क SMS-MMS’ पर रोक, फेसबुक-ट्विटर पर कड़ी नजर
असमियों के पलायन पर संसद में बरपा हंगामा
दिलासे काम नहीं आए, बेंगलूरु से असमियों का पलायन जारी
अफवाहों से हिला देश, असम से बैंग्लुरु तक अफरा-तफरी
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