24 जुलाई 2012
आईबीएन-7
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नई दिल्ली। केन्द्र सरकार ने आपराधिक कानून संशोधन विधेयक, 2012 को संसद में पेश करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है, जिसके तहत ‘बलात्कार’ शब्द के स्थान पर ‘यौन उत्पीड़न’ शब्द का इस्तेमाल किया जाएगा, ताकि यौन उत्पीड़न अपराध में लिंग भेद से बचा जा सके और इस अपराध का दायरा भी बढ़ाया जा सके।
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प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में हुई बैठक में इसे मंजूरी दी गई। प्रस्ताव के अनुसार यौन उत्पीड़न के लिए न्यूनतम सात वर्ष की सजा होगी, जिसे आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है। साथ ही जुर्माने का भी प्रावधन होगा।
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यौन उत्पीड़न के अधिक संगीन मामले यानी अपने अधिकार क्षेत्र में किसी पुलिस अधिकारी या लोक सेवक या प्रबंधक या अपने पद का फायदा उठाने वाले किसी भी व्यक्ति के इसमें शामिल होने पर उसे कठोर सजा दी जाएगी। जो दस वर्ष से कम नहीं होगी और जिसे आजीवन कारावास में तब्दील किया जा सकता है। इसके अलावा जुर्माने की भी व्यवस्था होगी।
यौन उत्पीड़न मामले में सहमति की आयु 16 वर्ष से बढ़ाकर 18 वर्ष कर दी गई है। लेकिन किसी पुरुष द्वारा 16 वर्ष की आयु की अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध स्थापित करने को यौन उत्पीड़न नहीं माना जाएगा। एसिड से हमला करने के लिए सजा बढ़ाने का प्रावधान भी किया गया है।
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गौरतलब है कि भारत के कानून आयोग ने बलात्कार कानूनों की समीक्षा के बारे में अपनी 172वीं रिपोर्ट में तथा राष्ट्रीय महिला आयोग ने यौन उत्पीड़न जैसे अपराध के लिए कठोर सजा देने की सिफारिश की थी। केन्द्रीय गृह सचिव की अध्यक्षता में गठित उच्च स्तरीय समिति ने इस विषय पर कानून आयोग की सिफारिशें, राष्ट्रीय महिला आयोग और विभिन्न जगहों से मिले सुझावों पर गौर करते हुए आपराधिक कानून संशोधन विधेयक, 2011 के मसौदे के साथ अपनी रिपोर्ट दी थी और सरकार से कानून बनाने की सिफारिश की थी। इसके मसौदे पर महिला और बाल विकास मंत्रालय तथा कानून और न्याय मंत्रालय के साथ विचार-विमर्श किया गया और आपराधिक कानून संशोधन विधेयक, 2012 का मसौदा तैयार किया गया।
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विधेयक की प्रमुख बातों के अनुसार भारतीय दंड संहिता की वर्तमान धाराओं 375, 376, 376ए, 376बी, 376सी और 376डी के स्थान पर अनुच्छेद 375, 376, 376ए और 376बी जगह लेंगे।
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