17 अक्टूबर 2012
CNN-IBN
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नई दिल्ली। सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा और डीएलएफ के बीच 2008 में हुए 58 करोड़ के मानेसर जमीन सौदे को लेकर कई और सवाल खड़े हो रहे हैं। नया सवाल ये है कि मानेसर में जमीन खरीदने के लिए वाड्रा की कंपनी को पैसे कहां से मिले? दरअसल, वाड्रा की कंपनी की बैंलेस शीट में बताया गया था कि मानेसर में जमीन खरीदने के लिए उनकी कंपनी ‘स्काई लाइट हॉस्पिटैलिटी’को कॉरपोरेशन बैंक से लगभग 8 करोड़ का ओवरड्राफ्ट मिला, लेकिन एक अंग्रेजी अखबार ने बैंलेस शीट में किए गए इस दावे की हवा निकाल दी।
लोन नहीं मिला तो बैंलेस शीट में कैसे हुआ दर्ज?
रिपोर्ट में कॉरपोरेशन बैंक के हवाले से दावा किया गया कि उसने वाड्रा को 8 करोड़ कोई ओवरड्राफ्ट दिया ही नहीं। इसके बाद वाड्रा और उनकी कंपनी चुप रही और सवालों में घिरी हरियाणा सरकार भी मामले पर कुछ नहीं बोली। इसी दौरान हरियाणा के IAS अशोक खेमका का तबादला हुआ और वह जाते जाते मानेसर में वाड्रा और डीएलएफ डील को रद कर गए। एक बार फिर मानेसर डील चर्चा में आई और इस बार CNN-IBN ने पड़ताल की। चैनल ने अपनी रिपोर्ट में सवाल किया कि अगर वाड्रा को कॉरपोरेशन बैंक से ओवरड्राफ्ट नहीं मिला तो जमीन खरीदने के लिए पैसा कहां से आया? वाड्रा के करीबी सूत्र उनकी बैंलेस शीट के उलट कह रहे हैं कि कॉरपोरेशन बैंक से कोई लोन नहीं लिया गया।
HDFC बैंक का भी लोन देने से इन्कार
मंगलवार को CNN-IBN ने HDFC बैंक से बात की तो एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि उन्होंने भी वाड्रा को कोई लोन नहीं दिया। वाड्रा के करीबी यह भी कह रहे हैं कि सोनिया गांधी के दामाद अभी ये बताने की स्थिति में नहीं हैं कि मानेसर डील के लिए उनकी कंपनी ने पैसा कहां से जुटाया? इतना ही नहीं, उन्हें यह भी नहीं पता कि अगर कोई लोन नहीं लिया गया तो कंपनी की बैंलेस शीट में 8 करोड़ के ओवरड्राफ्ट का जिक्र कहां से आया?
आखिर बैंक और वाड्रा में से कौन झूठा है?
वाड्रा की बैलेंस शीट पर बैंक की सफाई के बाद सवाल उठ रहा है कि आखिर कॉरपोरेशन बैंक या वाड्रा में से कौन झूठ बोल रहा है। अगर कॉरपोरेशन बैंक ने वाड्रा को पैसा नहीं दिया, तो वह उनकी बैलेंस शीट में कैसे दिख रहा है। इसके अलावा उन्होंने मानेसर में जमीन की पहली किस्त कैसे अदा की। गौरतलब है कि वाड्रा ने मानसेर में इस जमीन के सौदे के साथ ही रियल एस्टेट कारोबार में कदम रखा था।
वाड्रा ने 65 दिन बाद ही DLF को बेच दी जमीन
आरोप है कि चूंकि ये जमीन सोनिया गांधी के दामाद ने खरीदी थी, इसलिए हरियाणा सरकार ने भू-उपयोग बदलने की इजाजत दे दी। यानी इसका व्यावसायिक इस्तेमाल हो सकता है। चौंकाने वाली बात ये भी है कि 28 मार्च 2008 को हरियाणा सरकार ने वाड्रा को इस प्लॉट पर हाउसिंग कॉलोनी बनाने की इजाजत दी थी और सिर्फ 65 दिन बाद वाड्रा ने इसे DLF को बेचने का करार कर लिया। अपने तबादले को लेकर चर्चा में आए IAS अशोक खेमका की इस कहानी में एंट्री यही से होती है। खेमका हरियाणा के इंस्पेक्टर जनरल ऑफ रजिस्ट्रेशन थे, इसलिए उनकी नजर में भी ये सौदा आया।
उन्होंने सवाल-जवाब करना शुरू कर दिया, लेकिन खेमका की ये तेजी सरकार को पसंद नहीं आई। नतीजा ये हुआ कि 11 अक्टूबर को खेमका को तबादले का आदेश थमा दिया गया। अब इस पद पर खेमका 7 दिन से ज्यादा नहीं रह सकते थे सो, 12 अक्टूबर को खेमका ने वाड्रा की जमीन के सौदे की जांच के आदेश दिए और दस्तावेजों के आधार पर 15 अक्टूबर को सौदा रद्द कर दिया। जाहिर है, वॉड्रा और डीएलएफ की जमीन का विवाद थमता नजर नहीं आ रहा। जिस तरह से खेमका का तबादला किया गया है। उससे तमाम सवाल खड़े हो गए हैं। मामला और तूल पकड़ेगा, इसमें शक नहीं।
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20 मई 2013
Oct 17, 2012
सोन्या गांडी ने भारत से पैसे लूट कर ब्राडा को दे दिए हैं. क्योकि सोन्या को पता है, की भारतीय दो तीन दिन बोल-बाल के अपने आप चुप्प हो जाते हैं. दुख की बात यह है, की केजरिबल भी दो तीन महीने के बाद चुप्प हो जाएगा या चुप्प कर दिया जाएगा ! क्या होगा ह्मारे भारत का..
Vrun gandhi Gurgaon
Oct 17, 2012
बॅंक ने नहीं दिए तो सास ने दिया होगा हा हा हा...
mk das bhopal
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