13 फरवरी 2012
आईबीएन-7
स्मिता शर्मा
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नई दिल्ली। पाकिस्तान में फौज से लेकर विपक्षियों की नजर आज सर्वोच्च न्यायालय की तरफ लगी हुई है, जहां प्रधानमंत्री गिलानी की किस्मत तय होने वाली है। क्या गिलानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के खिलाफ भ्रष्टचार के पुराने मामले चलाने की इजाजत देंगे या फिर सर्वोच्च न्यायालय में तय होंगे उनके खिलाफ अवमानना के आरोप? क्या इस मुद्दे पर गिलानी की कुर्सी जाएगी? तमाम ऐसे सवाल हैं जिसके लिए हर किसी की नजर टिकी है पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय पर।
पाकिस्तान के वजीर-ए-आजम के भविष्य पर एक बार फिर तलवार लटक रही है। गिलानी मुल्क की सियासत में चुने हुए पहले प्रधानमंत्री हैं, जिनके खिलाफ न्यायालय की अवमानना के आरोप तय होने जा रहे हैं।
शुक्रवार को सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश इफ्तिकार चौधरी की बेंच ने समन रद्द करने की गिलानी की अपील खारिज कर दी थी। आरोप साबित होने पर गिलानी को 6 महीने की जेल भी हो सकती है। उस सूरत-ए-हाल में उन्हें अपना पद छोड़ना पड़ सकता है। साथ ही किसी भी सरकारी पद के लिए उन पर पांच साल तक रोक लग सकती है।
गिलानी की अपील खारिज, फिर अदालत में पेश होंगे
इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय की सात सदस्यीय खंडपीठ ने दो फरवरी को अदालत की अवमानना के आरोप में प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी पर अभियोग शुरू करने का फैसला किया था। दरअसल पूरे मामले की जड़ में है विवादित एनआरओ। मुशर्रफ के राष्ट्रपति रहते भ्रष्टाचार के मामलों में घिरे जरदारी समेत 8 हजार से ज्यादा नेताओं और अधिकारियों को 2007 में एनआरओ यानी राष्ट्रीय सुलह अध्यादेश के जरिए आम माफी दे दी गई थी। लेकिन 2009 में सर्वोच्च न्यायालय ने एनआरओ को खारिज करते हुए जरदारी के खिलाफ दोबारा जांच करने का आदेश दिया था।
इसी मामले की सुनवाई में समन जारी होने के बाद 19 जनवरी को अदालत पहुंचे गिलानी ने जिरह के दौरान तर्क दिया था कि राष्ट्रपति को पाकिस्तान के संविधान के तहत संरक्षण हासिल है। इसीलिए जरदारी पर लगे भ्रष्टचार के आरोपों की दोबारा जांच के लिए स्विस अधिकारियों से हुकूमत ने आग्रह नहीं किया और इसे अदालत की अवमानना के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।
गिलानी अगर स्विस अधिकारियों को जरदारी के खिलाफ मामलों की जांच के लिए चिट्ठी लिख दें, तो अवमानना का मामला वहीं खत्म हो जाएगा। लेकिन मुमकिन यह भी है कि पीपीपी सरकार इस जंग को कानूनी और संसदीय मंच पर कुछ वक्त और जारी रखे, इस उम्मीद के साथ कि किसी शहादत की सूरत-ए-हाल में साल भर के अंदर होने वाले आम चुनावों में पार्टी को सियासी फायदा हासिल हो। हालांकि आरोप तय होने के बाद गिलानी का फिलहाल प्रधानमंत्री पद पर बने रहना मुश्किल होगा।
गिलानी सबसे ज्यादा समय तक प्रधानमंत्री पद पर बने रहने वाले पहले चुने गए सियासतदान हैं। इससे पहले 1999 में पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ऐसे ही मामले में अदालत में पेश हुए थे, लेकिन उनके खिलाफ आरोप नहीं तय किए गए थे। लेकिन मौजूदा दौर में ऑपरेशन किल ओसामा और मेमोगेट प्रकरण के बाद से जहां सेना और सरकार के रिश्तों में गहरी दरारे आई हैं। वहीं सरकार और सर्वोच्च न्यायालय के बीच टकराव भी बढ़ता जा रहा है। ऐसे में फौज से लेकर विपक्षियों की नजर अब सर्वोच्च न्यायालय की तरफ लगी है, जहां प्रधानमंत्री गिलानी की किस्मत तय होने वाली है।
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