08 सितम्बर 2012
आईबीएन-7
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नई दिल्ली। मुंबई हमलों के चलते पटरी से उतरी भारत-पाक वार्ता की गाड़ी अब उस बुरे दौर को पीछे छोड़ आगे बढ़ चुकी है। दोनों देशों के बीच विभिन्न मुद्दों पर वार्ता की मेज सज चुकी है। इस माहौल में ‘आईबीएन7’ की एसोसिएट फॉरेन एडिटर स्मिता शर्मा ने बात की पाकिस्तान की राजनीति के कद्दावर चेहरे और तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी के अध्यक्ष इमरान खान से।
पेश हैं बातचीत के संपादित अंशः-
स्मिताः मुंबई हमलों के बाद पटरी से उतरी भारत-पाक वार्ता अब फिर आगे बढ़ी है। आप पिछले दो सालों में अब जो भारत-पाक संबंध हैं इन्हें कहां आंक रहे हैं?
इमरान खान : मुंबई हमले के बाद भारत का पाक से ताल्लुकात तोड़ना गलत था। मुंबई में जो दहशतगर्दी हुई उसमें पाकिस्तान का कोई कसूर नहीं था। पाकिस्तान में सभी लोगों ने इस घटना की निंदा की। टीवी पर जिसने भी वो वाकया देखा उसकी हमदर्दी मुंबई के लोगों के साथ थी। किसी पाकिस्तानी को मैं नहीं जानता जो मुंबई हमले पर गुस्सा न हुआ हो। मुंबई हमले को आधार बनाकर हमने जो वक्त बर्बाद किया और जो टेंशन बढ़ाई वो गलत था। भारत के लोगों में गुस्सा था, लेकिन गुस्सा तो दहशतगर्दों पर होना चाहिए था। मुल्क पर तो नहीं होना चाहिए था।
स्मिताः हमलों में पाक के प्रतिष्ठानों का हाथ होने की बातें भी सामने आई थीं और अंतरराष्ट्रीय जांच एजेंसियों से भी बाकायदा पता चला था कि कहीं न कहीं पाक अफसरों की इसमें भागीदारी थी?
इमरान खान: देखिए, ये महज आकलन है। ये ऐसे ही है जैसे हमारे यहां के मंत्री कहते हैं कि बलूचिस्तान में जो दहशहगर्दी हो रही है उसमें भारत और उसकी खुफिया एजेंसी रॉ का हाथ है। वहां पर हर रोज लोग मर रहे हैं। तो उसको आधार बनाकर हम कहें कि हम भारत से बात नहीं करते तो ये सही नहीं होगा। मेरा मानना है कि पाकिस्तान दहशतगर्दी से सबसे ज्यादा परेशान है। भारत में एक बार मुंबई हमला होता है पाकिस्तान में सालभर में 50 मुंबई जैसे हमले हो जाते हैं। पाकिस्तान में मुंबई जैसे हमलों में अब तक 45 हजार लोग मर चुके हैं।
स्मिताः भारत में ये आम धारणा है कि पाकिस्तान की पॉलिसी भी कहीं न कहीं आतंकवाद के लिए जिम्मेदार हैं। जबकि भारत के खिलाफ ऐसे सबूत नहीं हैं कि सीमा पार से आतंकी भेजे जा रहे हैं वहां?
इमरान खान : अगर आप भारत में बैठे हैं तो बदकिस्मती से क्योंकि हमारे ताल्लुकात इतने बिगड़ चुके हैं कि जो दहशतगर्दी वहां होती है तो कहते हैं कि वो पाकिस्तान से शुरू हुई। और पाकिस्तान में ये हालात हैं कि खासतौर पर बलूचिस्तान और दूसरे इलाकों में कई दूसरे गुट पाकिस्तान के खिलाफ आ रहे हैं। अफगानिस्तान भी पाकिस्तान के खिलाफ दहशतगर्दी कर रहा है। कहने का मकसद ये है कि हम एक दूसरे पर विश्वास नहीं करते हैं। मैं समझता हूं कि हमको पहले एक-दूसरे पर विश्वास करना होगा। विश्वास की नींव रखने के बाद ही हम आगे बढ़ें। अगर हमारा कश्मीर का मसला है, अगर कश्मीर मामला हमारे लिए इतना ही महत्वपूर्ण है तो हमें एक टेबल पर बैठकर बात करनी चाहिए, जो एक वक्त पर हो भी रहा था। इसका ये तो मतलब नहीं कि हम एक-दूसरे को अपना दुश्मन समझें।
स्मिताः क्या आपको वो विश्वास बढ़ता नज़र आ रहा है पिछले डेढ़-दो साल में?
इमरान खान : हां, मुझे थोड़ा नजर आया है, थोड़ा-सा फर्क पड़ा है। हालांकि इस दौरे में मुझे नहीं लगता कि कोई बड़ा ऐलान होगा। लेकिन मैं ये जरूर समझता हूं कि ये जो बातचीत है वो हमें थोड़ा आगे लेकर जाएगी। हमें ऐसी रिलेशनशिप स्थापित करनी होगी, जिसमें दोनों देशों का फायदा हो। एशिया महाद्वीप के ये वो दो देश है जो बड़ी तेजी से तरक्की कर सकते हैं। भारत तो तेजी से तरक्की कर ही रहा है, लेकिन अगर दोनों देशों के बीच अमन हो जाए तो इसका फायदा दोनों देशों को होगा, हम अपने राजनैतिक मसले आसानी से हल कर सकेंगे। अमन होने के बाद इसके इतने ज्यादा फायदे होंगे कि दोनों देश तरक्की के रास्ते पर आगे चलेंगे। टेंशन की वजह से दोनों देशों को नुकसान है।
स्मिताः पाकिस्तान के बारे में एक धारणा है कि भले ही वहां एक लोकतांत्रिक सरकार है लेकिन विदेश नीति वहां की आर्मी और आईएसआई चलाते हैं। क्या स्थिति यही है या जरदारी सरकार ही भारत-पाकिस्तान के मामले को आगे बढ़ा रही है?
इमरान खान : अगर जरदारी से कोई उम्मीद लगाएं तो वह अपने आपको धोखा देने वाली बात होगी। जरदारी की अभी सबसे बड़ी दिक्कत है कि वो स्विस बैंक में पड़े अपने 16 मिलियन डॉलर बचा लें भले ही उसके लिए सुप्रीम कोर्ट को खत्म कर दें।
स्मिताः आप जरदारी को क्रेडिट नहीं देना चाहते कि कम से कम भारत के साथ संबंधों में उन्होंने व्यक्तिगत पहल की है?
इमरान खान : व्यक्तिगत पहल जैसा क्या...वह तो पहले से जनरल मुशर्रफ के जमाने से है। मुशर्रफ के जमाने में तो बातचीत काफी तेजी से बढ़ रही थी। भारत और पाकिस्तान में जो भी अक्लमंद आदमी है उसको पता है दुनिया किधर जा रही है। हमारे लिए कोई च्वॉइस ही नहीं है सिवाय इसके कि हम अपने ताल्लुकात बेहतर करें।
स्मिताः क्या अब भी भारत पाकिस्तान के लिए दुश्मन नंबर-1 है या कुछ बदलाव आया है?
इमरान खान : पाकिस्तान को बने पांच साल हुए थे जब मैं पैदा हुआ था। मैं बड़ा हुआ लाहौर में। और लाहौर याद रखिए वो जगह है जब बंटवारे के बाद सीमा पार करते समय कत्लेआम हुआ। जिनके रिश्तेदार या परिजन मारे गए चाहे वो उधर जाने वाले हिंदू और सिख हों या इधर आने वाले मुसलमान। उनमें भारत विरोधी और पाकिस्तान विरोधी भावनाएं चरम पर थीं। धीरे-धीरे ये पीछे जाना लगा। जब मैंने क्रिकेट खेलना शुरू किया, भारत में जाकर क्रिकेट खेला, वहां के लोगों के साथ बातचीत की तब मुझे महसूस हुआ उनका भी हमारी तरह इतिहास है। हमारी बड़ी चीजें आपस में मिलती हैं। 2004-05 में जब पाकिस्तान लाहौर में मैच हारा और पाकिस्तान के लोग भारतीय टीम को बधाई दे रहे थे। जब भारत मद्रास में पाकिस्तान के साथ मैच हारा तब वहां की भीड़ ने पाकिस्तान टीम को बधाई दी। ये सबकुछ मेरे जमाने में नहीं था। अपने जमाने में तो मैं ये सोच भी नहीं सकता था। बदलाव आ चुका है। बीच में मुंबई हमले की वजह से टेंशन बढ़ गई। तो अब मैं समझता हूं कि वक्त आ गया है आगे बढ़ने का। लेकिन फिर भी स्ट्रांग लीडरशिप चाहिए जोकि बड़े फैसले करे। अब इसको उस लेवल पर ले जाएं कि हमारी तकदीर ही बदल जाएं।
स्मिताः लेकिन एक जो चीज बार-बार कही जा रही है, जरदारी साहब भी कह रहे हैं जब तक बड़े मसलों का समाधान नहीं हो जाता तब तक व्यापार इस स्तर तक ले जाया जाए कि दोनों की अर्थव्यवस्था एक-दूसरे पर निर्भर हो जाए?
इमरान खान : व्यापार एक जरिया होगा दोनों मुल्कों को करीब लाने का। हमने तो आपस में इतना कत्लेआम नहीं किया जितना यूरोप में हुआ। पिछली सदी में उनके तीन-चार करोड़ लोग कत्लेआम में मरे। अब देखिए वहां पर क्या है। क्योंकि उनके बॉर्डर खुले हैं, ट्रेड खुला है। उन सबका जीने का मकसद ऊंचा हो चुका है। दुनिया की त्वारीख बताती है कि अगर दो देश मिल जाते हैं तो सबको फायदा होता है। सारे लोग आगे बढ़ गए।
स्मिताः व्यापार के जरिए क्या आतंकवाद से डील किया जा सकता है। आज भी हम हाफिज सईद जैसे लोगों को पाकिस्तान की सड़कों पर खुले आम जहर उगलते हुए देखते हैं और आपकी पार्टियों के नुमाइंदे उनके साथ मंच पर खड़े होते हैं?
इमरान खान : देखिए, पहले तो हम उसका हिस्सा हैं नहीं। उन्होंने हमारा प्रतिनिधित्व मांगा था और दो जगहों पर हमने वो भेजा। लेकिन इसका ये मतलब नहीं है कि हम उनके विचारों के समर्थक हैं। हमारी पार्टी की कोशिश है कि मुल्क को इकट्ठा करें। मुल्क को इकट्ठा करने के लिए लोगों से बातचीत करें। इसके ये मतलब नहीं कि हम किसी की नीतियों को मानते हैं।
स्मिताः यानी आप हाफिज सईद को किसी भी तरह से बढ़ावा नहीं देते?
इमरान खान : मैंने दुनिया देखी है। मैंने दुनिया में देखा है कि आपस में जब पड़ोसी लड़ते हैं, जितने उनके अच्छे ताल्लुकात होते हैं। जितने वो हथियारों पर कम पैसा खर्च करते हैं और अपने इंसानों पर ज्यादा पैसा खर्च करते हैं वो मुल्क आगे बढ़ जाते हैं।
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