20 जून 2013

न्यूजलैटर सब्सक्राइब करें

CLOSE

Sign Up

लेख: दारा जो कभी न हारा

17 जुलाई 2012

 प्रियदर्शन


 

 

दारा सिंह का मैं कभी मुरीद नहीं रहा। बचपन में मैं सुनील गावसकर का फैन हुआ करता था। ये सत्तर और अस्सी के वे दशक थे जिनमें पहली बार क्रिकेट दूसरे खेलों को पीछे छोड़कर अपनी एक बड़ी जगह बना रहा था- बेशक, अपनी कामयाबियों की वजह से, नए इलाकों में अपने फैलाव के चलते और सुनील गावसकर के बाद कपिल देव से लेकर सचिन तेंदुलकर तक की उस चमकती हुई परंपरा के कारण, जिसने भारतीय क्रिकेट को एक अलग मुकाम दिया। इत्तिफाक से यही वे वर्ष थे जब भारत के गांव पीछे खिसकते जा रहे थे और शहर बड़े होते जा रहे थे। नब्बे के दशक में शुरू हुए उदारीकरण ने अचानक इन शहरों की शक्ल कुछ और बदलनी शुरू की, गांवों को कुछ और पीछे धकेलना शुरू किया। इक्कीसवीं सदी तो जैसे बिल्कुल अपनी नगर-योजना और अपना नागरिक एजेंडा लेकर आई, जिसमें नगर महानगर हो गए, घर अपार्टमेंट हो गए, मुहल्ले सेक्टर हो गए और हाट-बाज़ार मॉल में बदल गए। यह बाज़ारवाद आज भी स्थानीयता की अलग-अलग खुशबुओं को अपदस्थ कर एक वैश्विक पहचान स्थापित करने में लगा हुआ है जिसके कई आयाम हैं। एक आयाम खेलों की उस दुनिया में दिखता है जिसमें क्रिकेट मेरी तरह के शहरी मध्यवर्ग का शौक, शगल या जुनून भर नहीं रहा, वह बाज़ार का उपकरण हो गया है जिसका मक़सद एक ऐसा इकहरा राष्ट्रीय जुनून पैदा करना है, जिसकी मदद से पेप्सी-कोक से लेकर पजेरो-क्वैलिस तक बेचे जा सकें।

यह लंबी भूमिका बस यह याद दिलाने के लिए लिखी कि इस पूरे परिदृश्य में वह भारतीय भदेस गांव जैसे भूगोल, इतिहास, स्मृति सबकुछ से बेदखल होता जा रहा है जो दारा सिंह को अपना नायक बनाता था। ओलिंपिक में सुशील कुमार या विजेंदर जैसे भारतीय पहलवानों की शानदार कामयाबी के बावजूद कुश्ती या पहलवानी वह खेल नहीं है जिसे तथाकथित संभ्रांत घरों के उच्च मध्यवर्गीय लड़के अपनाएं- वे क्रिकेट के अलावा ज़्यादा से ज़्यादा टेनिस या फिर शूटिंग जैसे खेलों में दिलचस्पी ले सकते हैं, जहां एक करिअर ऑप्शन फिर भी उनकी नज़र में बनता है। यहां आकर हम पाते हैं कि दरअसल दारा सिंह का जाना उस भारतीय गांव के आख़िरी नायक का जाना है जो ख़ुद भी दम तोड़ रहा है। यह गांव अगर बचा है तो कुछ भूपतियों की सामंती ऐंठ में बचा है, कुछ बहुत कमज़ोर लोगों की मजबूरी में, कुछ अपने से लगे शहरों की फूहड़ नकल में और बाकी उन लाखों-करोड़ों विस्थापित जनों की स्मृति में, जो महानगर के दैनिक जुए में जुते हुए इस पूरी व्यवस्था को अपने छिले हुए कंधों पर खींच रहे हैं। यह एक नया भारत है जो पुराने भारत को जैसे नेस्तनाबूद करने पर तुला है।

जबकि वह पुराना भारत कितना मज़बूत था, उसके न दिखने वाले धागे कितनी दूर तक पसरे थे- यह दारा सिंह की लोकप्रियता बताती है। वे अपने जीवनकाल में किंवदंती और मुहावरे में बदल चुके थे। दारा सिंह होने, दारा सिंह बनने या दारा सिंह को ले आने का मतलब किसी को समझाने की ज़रूरत नहीं थी। ऐसी अपार शोहरत और पहचान हिंदी फिल्मों के कुछ सितारों के नसीब में आई हो तो आई हो, लेकिन किसी दूसरे खिलाड़ी को अब तक नहीं मिली। इन दिनों बाज़ार द्वारा रोज़ भगवान बताए जा रहे सचिन तेंदुलकर भी दारा सिंह जैसी वह पहचान हासिल नहीं कर सके हैं जो उन्हें किसी मुहावरे में बदल दे।

और यह सब दारा सिंह ने किस दौर में हासिल किया? जब टीवी नहीं था, जब विज्ञापनों की यह चमकती दुनिया नहीं थी, जब बाज़ार का यह कद्दावर और कानून से भी लंबा हाथ नहीं था, तब दारा सिंह को उनका गंवई और कस्बाई समाज अपने सिर पर लिए घूमता रहा, उनके पोस्टर लगाता रहा, तमाम अखाड़ों में उतारता रहा, लाउड स्पीकरों पर उनका प्रचार करता रहा और उनकी किंवदंतियां बनाता रहा।

निस्संदेह दारा सिंह की इस लोकप्रियता में कुछ हाथ पेशेवर कुश्ती के उस माहौल का भी रहा होगा जिसमें मिली-जुली कुश्तियां भी लड़ी जाती थीं, और कुश्ती लड़ाने वाले नकली दारा सिंह बनाम असली दारा सिंह का, या फिर दारा सिंह बनाम किंगकांग या दारा सिंह बनाम मैन माउंटेनजैक का तूमार बांधा करते थे। लेकिन दरअसल इन सबका वास्ता उस भोले भारत के हौसले और अभिमान से भी था जिसे लगता था कि उसकी ताकत को दुनिया में कोई चुनौती नहीं दे सकता। दारा सिंह की इस लोकप्रियता को देखते हुए ही हिंदी फिल्मों ने उन्हें अपने बीच जगह दी और जब ‘रामायण’ जैसे धारावाहिक के लिए अपराजेय हनुमान जैसा चरित्र खोजने की नौबत आई तो रामानंद सागर को दारा सिंह ही दिखे। यह हिंदुस्तान की वास्तविक जनता के दिलों में बैठा रुस्तमे हिंद, रुस्तमे जमां दारा सिंह था जिसको किसी और मुहर की, किसी और मेडल की, किसी और सर्टीफिकेट की ज़रूरत नहीं थी।

लेकिन मेरे लिए कह पाना मुश्किल है कि आज दारा सिंह होते तो उनको वही शोहरत और इज़्ज़त नसीब होती जो उस दौर में हुई। कई बार यह लगता है कि आज हम पहले से कहीं ज़्यादा परमुखकातर हैं। अपनी श्रेष्ठता पर, अपने सामर्थ्य पर हमको तब भरोसा होता है जब बाहर वाला हमारी पीठ थपथपाता है। हमें फिल्मों के लिए कांस के सर्टीफिकेट और ऑस्कर अवार्ड चाहिए, खेलों के लिए ओलिंपिक मेडल चाहिए, साहित्य के लिए बुकर चाहिए और प्रधानमंत्री पद की दावेदारी या सफलता-असफलता का पैमाना मापने के लिए ‘द टाइम’ चाहिए। मुश्किल यह है कि ऐसी जगहों पर पहुंचने की अपनी पात्रता होती है जो कुछ उनके जैसा ढलने से भी हासिल होती है। दारा सिंह बहुत सारी भूमिकाओं में ढले, लेकिन अंततः वही भारतीय पहलवान बने रहे जिसने किंगकांग को खूनी पंजा दांव लगाकर चित्त किया था। वे एक दौर के ग्रामगंधी, कस्बाई भारत के अभिमान और आत्मगौरव की निशानी थे- उस भारत के आख़िरी नायक, जिनका जाना याद दिलाता है कि इस बीच हमने न जाने कितने नायक खो दिए, उनसे लिपटी कितनी किंवदंतियां खो दीं और कितना आत्मगौरव खो दिया है।

(हिन्दी पत्रकारिता के जाने-माने नाम प्रियदर्शन झारखंड में जन्मे और कलम का प्यार उन्हें देश की राजधानी दिल्ली ले आया। लेकिन महानगर की चकाचौंध, भागमभाग की जिंदगी के बीच भी अपनी जमीन की खुश्बू खोने नहीं दी। लंबे समय से टीवी पत्रकारिता कर रहे हैं, लेकिन कलम से वास्ता बरकरार है। कई किताबें लिख चुके हैं, और कई लिखना जारी हैं। ‘जनसत्ता’ जैसे नामचीन अखबार हो या ‘तहलका’ मैगज़ीन, या फिर ‘एनडीटीवी इंडिया’ न्यूज चैनल, प्रियदर्शन की कलम हर बार आम आदमी पर बेहद संजीदा चली है।)




सम्बंधित खबरें

लेख: दारा सिंह पर उदय प्रकाश

वीकेंड मैगजीन: शक्ति और भक्ति से भरे थे दारा सिंह!

IN.COM POLL: 88% बोले, ‘हनुमान’ के लिए दारा सिंह ही सबसे बेहतर थे!

अलविदा दारासिंह!

 

अन्य लेख यहां पढ़ें 

लेख:चिदंबरम की आइसक्रीम और गरीब की अजब थ्योरी!

सलमा ज़ैदी ने साझा की बुश हाउस से जुड़ी यादें!

लेख: दारा सिंह पर उदय प्रकाश

लेख: भारत में विश्व जनसंख्या दिवस के मायने

लेख: एस. पी. के बाद न्यूज चैनलों की दुनिया

लेख: सूरमा भोपाली की नजर में पूनम का हाट फंडा

लेख: ‘फ्रेशर्स’ को जॉब क्यों नहीं मिलते?

लेख: नौकरी के इंटरव्‍यू पर जा रहे हो, तो ये पढ़े!

लंदन एक्सक्लूज़िव: गोरी मेम की ‘बिकिनी’, अब..

लेख: सूरमा भोपाली बोले- मियाँ मानसून, कब आ रिए हो?

लेख: ‘भोपाली’ बुजुर्गों के दर्द पर एक ‘भोपाली की कलम’

लेख: कलाम क्यों नहीं बन सकते राष्ट्रपति?


लेख: महान पिता की महान संतान ‘पंचम’


लेख: ऐसे थे मराठी सिनेमा के ‘दादा कोंडके’


लेख: क्या मुम्बई के डिब्बेवालों, तिरुपुर और नमक्कल से हम कुछ सीखेंगे?


लेख: भारत को कैसे मिले अब तक के अपने राष्ट्रपति


लेख: बाजार, राजनीति और सत्ता के निशाने पर है भारतीय स्त्री की शुचिता

लेख: व्यक्तिगत ईमानदारी के मायने

लेख: रिश्वत के वो लड्डू



‘हमारे लेखक’ के अंतर्गत अन्य लेख यहां पढ़ें

 

खास खबरों पर पढ़िए खास नजर, ‘एडिट पेज’


सप्ताह भर की ख़ास खबरों पर पढ़ें विस्तृत जानकारी, ‘वीकेंड मैगजीन’

 

 

यह खबर आपको कैसी लगी

10 में से 0 वोट मिले

पाठकों की राय

20 जून 2013

प्रमुख ख़बरें
आज के वीडियो
देखें, सन्नी लियोन का अलग अवतार
देखें, सन्नी लियोन का अलग अवतार
देखें, ‘पुलिसगिरी’में प्राची की दादागिरी
देखें, ‘पुलिसगिरी’में प्राची की दादागिरी
देखें, क्या है विद्या का हॉट दिखने का सीक्रेट
देखें, क्या है विद्या का हॉट दिखने का सीक्रेट


ख़बरें

सबसे ज्यादा पाठकों की राय

बाक़ी


Live TV | Stock Market India | IBNLive News | Cricket News | In.com | Latest Movie Songs |Latest Videos |Play Online Games | Rss Feed | हमारे बारे में  |   हमारा पता  |  हमें बताइए  |  विज्ञापन  |  अस्वीकरण  |  गोपनीयता  |  शर्तें  |  साइट जानकारी
© 2011, Web18 Software Services Ltd. All Rights Reserved.