17 अगस्त 2012
निमिष कुमार,
संपादक,
हिन्दी इन डॉट कॉम
मुम्बई। गजब है! हमारे देश में कितना आसान हो गया हंगामा बरपाना। ना बम फेंकने की जरूरत, ना कत्लेआम की। बस एक सिरफिरा मैसेज डाल दीजिए किसी को मोबाइल पर या किसी सोशल मीडिया साइट पर, और फिर देखिए हम कैसे मूर्खता की हदों को बेवकूफों की तरह पार करते हैं। अच्छा-खासा पढ़ा-लिखा, समझदार माना जाने वाला हमारा समाज कुछ ‘ज्यादा ही समझदार’ हो जाता है और ऐसे रियेक्ट करता है कि दुनिया हम पर हंसती है- जैसे हम चलते-फिरते, बेवकूफाना हरकतें करते कोई जोकर हों। सही भी है, क्यों ना हंसे दुनिया हम पर। करीब एक दशक दिल्ली के निम्न-मध्यमवर्गीय इलाके जमना पार में कोई एक सिरफिरा चिल्लाने लगता है- मंकीमैन आया, मंकीमैन आया, और खुद को ‘ज्यादा ही चतुर’ समझने वाली दिल्ली बेवकूफों की तरह गली-गली, सड़क-सड़क दौड़ने लगती है, भेड़ के झुंडों की तरह, हाथ में लाठी, बरछे, भाले लिए, मशाल और टार्च की रोशनी में, आधी रात को, शोर मचाते हुए- पकड़ो-पकड़ो!
ऐसे ही किसी एक साल सितंबर महीने की 21 तारीख को पूरा देश पगलाया-सा दिखता है। सुबह से दोपहर होते-होते पूरा देश मंदिरों के बाहर भीड़ लगाया हुआ दिखता है। हर कोई हाथ में दूध की कटोरी लिए खड़ा होता है एक आस लिए-बस, किसी तरह गणेशजी को दूध पिला दे। अमेरिका से, लंदन से, दुनिया के कोने-कोने में बसे परिजन फोन कर-कर पूछ रहे थे- गणेशजी को दूध पिलाया क्या?
ऐसे ही कुछ महीने देश की आर्थिक राजधानी कही जाने वाली मुंबई घबरा जाती है। हर कोई परेशान है और दूसरों को हड़बड़ाहट में फोन करता दिखता है, एसएमएस कर रहा है। फिर वहीं न्यूयार्क, लंदन और जाने कहां-कहां से फोन आते रहते हैं- भई, बांद्रा-वर्ली सी-लिंक पर तो नहीं हो? आस-पास भी नहीं? सी-लिंक से जाने का इरादा तो नहीं है ना? आज सी-लिंक से बिलकुल मत जाना। बस और पूरी मुंबई एक सिरफिरे की करतूत से बेवकूफ बन जाती है।
दरअसल अफवाहों को लेकर हम ऐसे ही रियेक्ट करते हैं, और अफवाहों पर हमारे देश में ऐसा ही माहौल हो जाता है, हर तरफ अफरा-तफरी का। बिना समझे-बूझे हम बेहताशा दौड़ने लगते हैं, बिना जाने की हम कहां जा रहे हैं, और क्या कर रहे हैं? सिर्फ इसीलिए कि पढ़े-लिखे, खुद को समझदार समझने वाले हम भी एक सिरफिरी अफवाह के शिकार होते हैं। हो भी क्यों ना? क्योंकि देश में सरकारें चलें ना चलें, अफवाहें पंख लगाकर दौड़ती हैं!
देश में अफवाहों का बाजार गर्म है, वो भी देश के उन शहरों में जहां इस तरह की वारदातें पहले नहीं होती थीं। बैंग्लुरु हो या हैदराबाद, पुणे हो या मुंबई, देश में अपने प्रोफेशनलिस्म के लिए जाने-जाते इन शहरों में रहने वाले हजारों उत्तर-पूर्व के लोग अपने घरों को लौट रहें हैं। इन शहरों में रहने वाले उत्तर-पूर्व के लोग डरे हुए हैं। सहमे हैं किसी संभावित हमले की आशंका से। परेशान हैं हजारों किलोमीटर दूर अपने गांव, कस्बे में रहने वाले अपने मां-बाप, परिवारवालों के फोन कॉल्स से। जो बार-बार कह रहे हैं- बेटा, घर आ जा। और अपने घरों से हजारों किलोमीटर दूर रोजी-रोटी की तलाश में आया ये परेशान युवा वर्ग डरकर वापस जाने की ट्रेन पकड़ रहा है। समय बीत रहा है और हालात है कि काबू में आ नहीं रहे हैं। सुना है कर्नाटक के मुख्यमंत्री और दूसरे मंत्री रेल्वे स्टेशन पर गए और लोगों से मिले। उत्तर-पूर्व के सहमें लोगों के साथ बैठें, ये बताने के लिए कि वो बैंग्लुरु में सुरक्षित हैं। हैदराबाद के सांसद ने साइबराबाद इलाके का दौरा किया और उत्तर-पूर्व के लोगों को दिलासा दिया। पुणे में पुलिस ने कुछ लोगों को गिरफ्तार भी किया। बावजूद इसके हालात पर पूरी तरह से काबू पाया नहीं जा सका है क्योंकि देश में सरकारें चलें ना चलें, अफवाहें पंख लगाकर दौड़ती हैं!
दुखद ये है कि हमारे हुक्मरॉन इस पूरे मामले को संभालने में बुरी तरह फेल होते दिखे, ठीक वैसे ही जैसे क्लास में पीछे की बैंचों में बैठे बदमाश किस्म के लड़के स्कूल में फेल हुआ करते थे। हर सब्जेक्ट में फेल। किसी में जीरो तो किसी में महज पांच-छह नंबर। हमारे हुक्मरानों का रिपोर्ट-कार्ड भी क्लास के उस डफर बच्चे की तरह था, हर बार फेल। क्या अब तक पता चल पाया कि दिल्ली के उस मंकीमैन की कहानी के पीछे कौन था? नहीं ना? दिल्ली पुलिस ने इस मामले में अब तक कितनों को पकड़ा? कितनों को गिरफ्तार किया? कितनों पर मुकदमा चला?
गणेशजी दूध पी रहे हैं, ये किस महाशय के दिमाग की उपज थी? क्या सरकार आज तक जान पाई? क्या सरकार ने कोई ऐसी रिपोर्ट सार्वजनिक की, जिससे पता लग सके कि गणेशजी के दूध पीने की अफवाह का इस तेजी से फैलना और उसका देशभर में असर कैसे हो गया? वो तो गणेशजी के दूध पीने की खबर थी, यदि कुछ और अफवाह होती तो? जैसे अभी किसी अफवाह के, जिससे हजारों असम और उत्तर-पूर्व के लोगों के मन में डर बैठ गया है।
क्या कभी सरकार ने मुंबई के बांद्रा-वर्ली सी-लिंक को लेकर अफवाह फैलाने वाले शख्स को सरेआम सजा देने का नहीं सोचा? जिससे आगे से कोई इस तरह की अफवाह फैलाने के विचार को अंजाम देने से पहले चार बार सोचे।
नहीं, ऐसा कुछ नहीं हुआ। अफवाह फैलने और उसके पूरे देश में हंगामा बरपा देने के बाद भी हमारी सरकारें, पुलिस, इंटेलिजेंस एजेंसियां और आला अधिकारी कुछ सीखते नहीं दिखे। और परिणाम सामने हैं। फिर एक सिरफिरी अफवाह, और पूरा देश परेशान।
प्रधानमंत्री ने अपने नपे-तुले शब्दों में, धीमी आवाज में संसद में कहा कि हम उत्तर-पूर्व के लोगों को सुरक्षा का भरोसा दिलाते हैं। विपक्ष ने हर बार की तरह इस बार भी सरकार से, प्रधानमंत्री से मांग करने की रस्म अदायगी की और चुप। ना हमारी सरकार, ना हमारी सुरक्षा एजेंसियां इस मामले पर गरजी, बरसी और एक्शन में दिखीं। कैसे भरोसा करें आम आदमी? जब आज तक आपने किसी अफवाह फैलाने वाले सिरफिरे को कड़ी से कड़ी सज़ा नहीं दी, तो फिर आज कैसे उत्तर-पूर्व के हजारों लोग आपकी बात पर यकीं करें? दरअसल सरकार को लगा कि ऐसी-वैसी ही कोई अफवाह होगी। थोड़ी देर बाद सब शांत हो जाएगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। सरकार की लाख कोशिशों के बाद भी, मीडिया की लोगों से बार-बार अपील के बाद भी, समाजसेवी संस्थाओं के बार-बार कहने के बावजूद असम सहित उत्तर-पूर्व के लोग भाग रहे हैं, उन शहरों से, जिन्हें हम दुनिया भर में अपने यहां के ‘सबसे सेफ शहर’ कहते आए हैं। शायद हमारी सरकार ये समझ नहीं पाई कि देश में सरकारें चलें ना चलें, अफवाहें पंख लगाकर दौड़ती हैं!
ऐसा नहीं कि हम या हमारी सरकारें अफवाहों की इस अफरा-तफरी से पहली बार रुबरु हो रहीं हैं। अफवाहों का तो हमारे देश से, हमारे समाजों से, हमारे लोगों से, साल-दर-साल का नाता रहा है। यूं कहें तो अफवाहें जैसे हमारी जिंदगी का हिस्सा-सा हो गई हैं। हम- आप बातों-बातों में अफवाहों को जन्म दे देते है, बिना ये समझें की इसके परिणाम कितने घातक होते हैं। क्योंकि हमें डर नहीं होता कि अफवाहें फैलाना भी कोई जुर्म है? हमें डर नहीं होता कि अफवाह फैलाने के लिए भी हमें पुलिस पकड़ सकती हैं? हम नहीं जानने की कोशिश करते कि अफवाह फैलाने पर सज़ा भी हो सकती है और हम जेल भी जा सकते हैं? लेकिन इसके लिए हम-आप से ज्यादा दोषी हमारी पुलिस, अधिकारी और सरकारें हैं। क्या आपने कभी किसी अफवाहों फैलाने वाले को सजा पाते देखा है? क्या आपने सुना कि मंकीमैन या उत्तर-पूर्व के लोगों पर हमले की अफवाह फैलाने वालों को हमारी पुलिस ने ढूंढ निकाला हो? नहीं, क्योंकि हमारी पुलिस इस तरह के काम करने के लिए या तो ट्रेंड नहीं है या करना ही नहीं चाहती। क्योंकि पुलिस यदि चाहती, आला अधिकारी यदि चाहते, सरकारें यदि चाहती, तो इस तरह की अफवाहें फैलाकर हजारों उत्तर-पूर्व के हमारे साथियों को परेशान करने वाले अब तक देश के सामने हथकड़ियों में होता। उस पर पुलिस मामला दर्ज कर चुकी होती और मुकदमे की तैयारी शुरू हो चुकी होती। ज़रा याद कीजिए मुंबई में करीब एक साल पहली उस अफवाह का मंजर। जब एक सिरफिरे संदेश ने देश की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले पूरे मुंबई को परेशान कर दिया था। जिसमें कहा जा रहा था कि मुंबई के बांद्रा-वर्ली सी-लिंक से ना जाएं। सारा मुंबई परेशान हो गया था। हालात इतने खराब हो चुके थे, कि मुंबई में रहने वाले कई लोगों को विदेशों से उनके परिजनों के कॉल्स आने लगे। सोशल मीडिया साइट्स, मोबाइल एसएमएस से फैलता अफवाहों का जाल कब कुछ ही घंटों में पूरे मुंबई सहित दुनिया को अपने घिनौने जाल में जकड़ चुका था, कोई जान नही पाया। ना खुद को स्कॉटलैंड यार्ड या एफबीआई के समतुल्य समझने वाली मुंबई पुलिस, ना ही मुंबई को चलाने वाले हमारे राजनेता। बाद में मीडिया का प्रेशर था, या खुद की साख बचाने की जद्दोजहद, जब पुलिस काम पर लगी तो उस आदमी को ढूंढ ही निकाला। बताया जाता है कि वो निकला- बॉलीवुड में छोटे-मोटे रोल करने वाली अदाकारा और टीवी पर क्रिकेट मैच कमेंटेटरों के साथ लो-गले का ब्लॉउज पहनकर सुर्खियों में आने वाली मंदिरा बेदी का पति राज कौशल। सुना था कि बाद में जब पुलिस ने खुद को बॉलीवुड प्रोड्यूसर बताने वाले राज कौशल को पकड़ा, तो राज कौशल ने ये कहते माफी मांगी कि वो तो एक मजाक था। शायद वो बेवकूफाना हरकत करते वक्त उस शख्स ने ये नहीं सोचा होगा कि देश में सरकारें चले- ना चले, अफवाहें पंख लगाकर दौड़ती हैं!
लेकिन ये अफवाहें अब कुछ सवाल पीछे छोड़ जा रही हैं? आखिर असम और उत्तर-पूर्व को लोगों को लेकर ऐसी अफवाह फैलाने के पीछे क्या हो सकता है? क्या असम में हुई हिंसा से इसके तार जुड़े हैं? क्या मुंबई में हाल ही में हुए एक समुदाय के हिंसक व्यवहार से इन अफवाहों का कोई नाता है? कहीं ऐसा तो नहीं कि राजनैतिक दल असम में हिंसा का चुनावी फायदा उठाना चाहते हैं? क्या कोई असम में हो रही हिंसा से अपना वोट बैंक मजबूत करने की जुगाड़ में है? क्या किसी राजनैतिक दल को ये लगता है कि उसका वोट बैंक कमजोर हो रहा है? क्या किसी संगठन को लगता है कि इस तरह की अफवाहों से उसके अनुयायी बढ़ेंगे? आखिर सरकार असम में बांग्लादेशी मुसलमानों की घुसपैठ को लेकर शांत क्यों है? क्या इसीलिए कि वो एक वोट बैंक हैं? क्या इन अफवाहों के पीछे कोई विदेशी ताकत है जो हमारे सेफ कहे जाने वाले शहरों को दुनिया में बदनाम कर देना चाहती है जिससे इन शहरों में आने वाला विदेशी निवेश रुक जाए? अफवाहों के पीछे की राजनीति हो या सुरक्षा एजेंसियों की नाकामी, हर बार शिकार आम आदमी ही होता है, लेकिन सरकारें हैं कि मानो चादर तान कर सो रही हैं। ‘हिन्दी इन डॉट कॉम’ अपने पाठकों से अपील करता है कि आप अब ना किसी अफवाह को फैलने देंगे, ना फैलाएंगे। क्योंकि देश में सरकारें चलें ना चलें, अफवाहें पंख लगाकर दौड़ती हैं!
एक भारतीय
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