22 अक्टूबर 2012
निमिष कुमार,
संपादक,
हिन्दी इन डॉट कॉम
यश चोपड़ा नहीं रहे। प्रख्यात फिल्म समीक्षक सुभाष के झा की मानें तो यश चोपड़ा ने फिल्म ‘दिलवाले दुलहनिया ले जाएंगें’ के बाद कहा था- मैनें इतना पैसा पहले नहीं देखा था। यश चोपड़ा की बात सही भी थी। यश चोपड़ा के यशराज फिल्म्स की फिल्म ‘दिलवाले दुलहनिया ले जाएंगें’ २० अक्टूबर,१९९५ को रिलीज हुई थी। इस फिल्म ने बॉलीवुड की दुनिया बदल दी थी। यश चोपड़ा ने घरेलू मार्केट से करीब १०० करोड़ रुपये कमाकर बता दिया था कि फिल्में सुपर-हिट होना किसे कहते है? ये यश चोपड़ा की परदे पर फिल्माई जादूगरी थी कि राज और सिमरन देश के युवाओं के सपनों में आने लगे। हर जवान लड़का-लड़की राज-सिमरन की तर्ज पर मोहब्बत में गिरफ्तार होने की गुस्ताखी करने लगे। अपने आस-पास पूछिए तो पाएंगें कि आपके परिचितों में दसियों ऐसे होंगे जिन्होंनें डीडीएलजे एक दो नहीं १०० बार या उससे ज्यादा देखी है। उस वक्त जब ऑडियो कैसेट का जमाना था, और घर में ऑडियो प्लेयर हो, डेक हो या म्युजिक सिस्टम और डीडीएलजे का ऑडियों कैसेट ना हो, ऐसा होता ही नहीं था। मैं ऐसे तीन भाईयों को जानता हूं जो अपने कॉलेज के दिनों में सुबह से शाम तक और शाम से देर रात तक अपने कमरे में डीडीएलजे का कैसेट बजाते रहते थे। जब एक कैसेट घिस जाता तो दूसरा खरीद लाते। डीडीएलजे के कैसेट सुनने, सुन-सुनकर उसे घिस देने और फिर नया खरीद लाने का वो सिलसिला महीनों तक चला। आज भी मुंबई के मराठा मंदिर सिनेमाहॉल में डीडीएलजे लगी हुई है, और आज भी भीड़ डीडीएलजे देखने के लिए इक्ठ्ठा होती है। १७ साल बीत गए, लेकिन यश चोपड़ा की डीडीएलजे का जादू आज भी बरकरार है। बॉक्स ऑफिस सूत्रों की मानें तो यश चोपड़ा की डीडीएलजे अब तक ३०० करोड़ से ज्यादा कमा चुकी है, और आज भी टीवी पर या डीवीडी मार्केट में हिट है। ये तो यश चोपड़ा के एक फिल्मकार के रुप में बानगी बस थी। डीडीएलजे और उसकी सफलता को देखकर कोई भी कह सकता है कि यश चोपड़ा दर्शकों, बाजार की नब्ज़ जानते थे?
दरअसल १९५९ में अपने बड़े भाई बीआर चोपड़ा, महाभारत सीरियल बनाने वाले, के असिस्टेंट के रुप में फिल्म दुनिया में पैर रखने वाला वो पाकिस्तानी मूल का पंजाबी नवजवान जल्दी ही समझ गया कि फिल्मों का बाजार क्या चाहता है। शायद इसीलिए यश चोपड़ा कई पीढ़ियों के लिए हिट फिल्में बनाने वाले फिल्मकार साबित हुए। राजकुमार जैसे अपनी डॉयलॉग डिलेवरी के लिए मशहूर अभिनेता से ‘चिनाय सेठ, जिनके घर शीशों के होते है, वो दूसरे के घर पत्थर नहीं फेंकते’ का जुमला अमर कर देने वाले यश चोपड़ा की फिल्म ‘वक्त’ ना केवल उस वक्त, बल्कि आज तक राजकुमार की डॉयलॉग डिलेवरी की एक मील का पत्थर फिल्म मानी जाती है। यश चोपड़ा को मालूम था कि उस वक्त का हिंदुस्तान सोशल ड्रामा पसंद करने वाला था, इसीलिए यश चोपड़ा उसी रौ में बहते गए और हिट पर हिट देते रहे। उसी यश चोपड़ा ने १९७१ में जब यशराज फिल्म्स नाम से अपनी प्रोडक्शन कंपनी शुरु की तो राजेश खन्ना के रुमानी दौर को खूब भुनाया। लेकिन उसी यश चोपड़ा ने अमिताभ बच्चन के साथ ‘दीवार’ जैसी फिल्म बनाई और अमिताभ बच्चन के यंग एंग्रीमैन के ‘मेरे पास मां है’ ‘जाओ पहले उस आदमी का साइन लेकर आओ’ जैसे डॉयलॉग भारतीय सिनेप्रेमियों के दिलोदिमाग पर छा गए। उसी यश चोपड़ा ने ‘सिलसिला’ बनाकर अमिताभ-रेखा के तथाकथित लव-अफेयर की खबरों को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सुनते है कि उसके बाद अमिताभ और यश चोपड़ा में दूरियां बढ़ गई, लेकिन यश चोपड़ा रुके नहीं। शायद इसीलिए कहते है कि यश चोपड़ा दर्शकों, बाजार की नब्ज़ जानते थे।
९० के दशक में अपनी उम्र के साठवें दशक में चल रहे यश चोपड़ा ने शाहरुख खान के साथ मिलकर बॉलीवुड में रुमानी फिल्मों का एक नया दौर शुरु किया। इसमें बहुत-सी बातें यश चोपड़ा ट्रेडमार्का थी, तो कुछ बिलकुल नए प्रयोग भी थे। नब्बे के दशक के आर्थिक उदारीकरण के दौर से गुजर रहे भारत को, उसकी अमेरिका जाने को मरी जा रही युवा पीढ़ी को और विदेशों में बैठे लाखों-करोड़ों कमा रहे एनआरआई परिवारों को यश चोपड़ा ने अपनी फिल्मों से टारगेट किया। यश चोपड़ा ने उन्मुक्त होते युवा उपभोक्ताओं के बाजार को, उनकी ताकत को पहचाना, और अपनी फिल्मों को उस दर्शक वर्ग के लिए बनाने शुरु किया जो मल्टीप्लेक्सेस में जाना शुरु कर चुका था। अब यश चोपड़ा की फिल्मों में विदेशों, खासकर यूरोप और अमेरिका के सीन होने लगे। फिल्मों के पात्र, खासकर हीरो-हीरोईन चटक रंग की डिज़ाइनर ड्रेसेस पहनने लगे। गीतों के बोल युवा वर्ग की भावनाओं को समझकर गढ़े जाने लगे। संगीत रुमानियत से भरपूर और बेहतर म्युजिक सिस्टम पर बेहतरीन पर्फोमेंस देने वाला बनाया जाने लगा। फिल्मों की थीम कुछ ऐसी रखी गई कि विदेशों में बसा धनी एनआरआई फिल्मों को देखे और अपने देश, अपनी संस्कृति को याद रखे। यशराज फिल्म्स की फिल्में में अब नये युग का भारत था, और शायद इसीलिए यशराज की फिल्में जितना भारत में कमा रही थी, उससे कहीं ज्यादा वो विदेशों में माल छाप रही थी। शायद इसीलिए कहते है कि यश चोपड़ा दर्शकों, बाजार की नब्ज़ जानते थे।
दरअसल यश चोपड़ा पैसा कमाना जानते थे, शायद इसीलिए दीवार जैसी फिल्म में अमिताभ बच्चन को यंग एंग्रीमैन बनाने वाला फिल्मकार, नब्बे के दशक में शाहरुख खान को डीडीएलजे में रुमानी राज बनाने से नहीं चूका। यश चोपड़ा कभी फिल्मों में आदर्शवाद, नैतिकता के पाठ पढ़ाने नहीं बैठे, ना ही वो फिल्मों के जरिए समाज बदलने का सपना देखते थे। यश चोपडा़ ने फिल्में बनाई तो विशुध्द मनोरंजन के लिए। ऐसी फिल्में जो बाजार के रुख के हिसाब से होती थीं। जब देश का युवा देश में फैली बेरोजगारी, अव्यवस्था से गुजर रहा था, यश चोपड़ा की फिल्मों का नायक समाज के ताने-बाने से विद्रोह करता दिखा। लेकिन वहीं यश चोपड़ा नब्बे के दशक में अपने हीरो को रुमानी बनाने से नहीं चूके। अस्सी के दशक में जब अमिताभ-रेखा के लव अफेयर की खबरें जोरों पर थी, तो यश चोपड़ा फिल्म ‘सिलसिला’ ले आए। शायद ये यश चोपड़ा की भारतीय सिनेमा की व्यवसायिक समझ ही थी, कि यश चोपड़ा उनके समकालीन कई महान फिल्मकारों की तरह वित्तीय तौर पर बरबाद नहीं हुए। यश चोपड़ा ने निर्माता-निर्देशक के तौर पर शुरुआत की और अंत तक वही रहे। यश चोपड़ा ने ना कभी अमिताभ बच्चन की तरह अपनी लाइन छोड़ी, ना देवआनंद की तर्ज पर अपने लिए फिल्में बनाई। शायद वो जानते थे कि बाजार में टिके रहने के लिए क्या करना चाहिए। इसीलिए आज यशराज फिल्म्स भारत के सबसे बड़ी फिल्म प्रोडक्शन कंपनी के रुप में जाना जाता है। यशराज बैनर की फिल्में साल-दर-साल बॉक्स ऑफिस पर करोड़ों-अरबों कमाती है, फिर वो हालिया रिलीज ‘एक था टाइगर’ हो या ‘रब ने बना दी जोड़ी’। इतना ही नहीं यश चोपडा़ की आखिरी फिल्म कही जाने वाली शाहरुख-कैटरिना-अनुष्का स्टारर ‘जब तक है जान’ इस दीवाली पर रिलीज होने के पहले ही इतनी हाइप हो चुकी है कि रिलीज होने के पहले ही मुनाफा कमा लेगी, और शायद रिलीज होने पर सुपरहिट हो जाए, क्योंकि आखिर उस फिल्म के साथ यश चोपड़ा की आखिरी फिल्म होने का टैग जो लग चुका है। मतलब मरकर भी यश चोपड़ा अपनी फिल्म की बाजार में सफलता सुनिश्चित कर गए। शायद यश चोपड़ा दर्शकों, बाजार की नब्ज़ जानते थे।
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