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आजादी@65: महिलाओं को उनके पसंद की कपड़े पहनने की आजादी?
14 अगस्‍त 2012
hindi.in.com
शकील अहमद


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उमंग सभरवाल दिल्ली की छात्रा हैं और लड़कियों के कपड़े पहनने के अधिकार के लिए भारत में ‘स्लटवॉक्स’ मुहिम का हिस्सा बनने जा रही हैं, उसे लेकर आगे बढ़ रही हैं। दुनिया भर में इस ‘स्लटवॉक्स’ का आयोजन कनाडा के टोरंटो शहर के एक पुलिस अधिकारी के उस बयान के खिलाफ शुरू हुआ है, जिसमें उसने एक बलात्कार के मामले के बाद कहा कि महिलाओं को बलात्कार जैसी घटनाओं का शिकार होने से बचने के लिए ‘वेश्याओं’ जैसे कपड़े नहीं पहनने चाहिए!
   
उसके बाद इस पुरुष मानिसकता के खिलाफ टोरंटो में शुरू हुआ वह विरोध आज दुनिया भर में फैल गया है। इस प्रदर्शन के जरिए महिला प्रदर्शनकारी यह बताना चाहती हैं कि महिलाएं चाहें जैसे कपड़े पहनें, लेकिन उन्हें इस आधार पर यौनाचार का शिकार नहीं बनाया जा सकता, उनके कपड़ों को देखकर उन पर फब्तियां नहीं कसी जा सकतीं या फिर उन्हें यौन सम्बंधों का प्रस्ताव नहीं दिया जा सकता।
  
उमंग कहती हैं कि महिलाएं कुछ भी पहनें, साड़ी पहनें या छोटी-से छोटी स्कर्ट, लेकिन उन्हें इसके लिए अपमानित नहीं किया जा सकता।

सच ही है कि हर महिला को वह पहनने का अधिकार है, जो वह पहनना चाहती है, जो वह समझती है कि उसके लिए ठीक है, खूबसूरत है, उचित है और सुरक्षित है। जब वह अपनी पसंद की पोशाक पहनती है तो उसे पता होता है कि वह क्या पहन रही है, क्यों पहन रही है और उसके पहनने से क्या हो सकता है और क्या नहीं।
 
पुरुष मानसिकता के तले जीने को मजबूर महिलाएं क्या यह तय नहीं कर सकतीं कि उन्हें किस तरह के कपड़े पहनने चाहिए?

आज जब वह जीवन के हर क्षेत्र में पुरुष के साथ है और कहीं शीला दीक्षित, कहीं मायावती, कहीं ममता बनर्जी और कहीं चंदा कोचर, कहीं इंदिरा नूयी और कहीं सुनीता वीलियम्स बनकर अपनी शक्ति, सामर्थ्य और क्षमता का परचम फहरा रही है और देश-समाज के बड़े-बड़े फैसले करने लगी है तो उसे अपनी पोशाक, अपना पहनावा तय करने के लिए किसी और का मुंह क्यों तांकना पड़े? और किसी ख़ास क़िस्म की पोशाक या पहनावा पहनने पर उसे बलात्कार का शिकार क्यों होना पड़े? किसी के तानों और किसी की बुरी नज़र से अपमानित क्यों होना पड़े?

एक महिला के रूप में, एक ख़ूबसूरत, आकर्षक जिस्म लेकर पैदा होने का ख़ामियाज़ा क्या उसे इस तरह चुकाना होगा कि वह ज़रा आकर्षक और ख़ूबसूरत लगे तो बलात्कार और यौनाचार का शिकार हो जाए?

नहीं, हरगिज़ नहीं! इसीलिए कनाडा से लेकर दिल्ली तक महिला संगठनों और युवाओं में एक सुगबुगाहट ने जन्म लिया कि उनके कपड़े पहनने के अधिकार को छीने जाने से बचाना होगा, उसे सहजकर रखना होगा। अच्छा दिखना, रहना और महसूस करना बेहद निजी मामला है और हर एक का अधिकार भी है। जीवन अपने ढंग से जीने के अधिकार के तहत यह अधिकार भी शामिल है, बशर्ते आप किसी और के जीवन के साथ खिलवाड़ न करें और न उसके जीने के अधिकार का हनन करें।
 
लेकिन यहां संयम बरतना भी दरकार है। महिलाओं को अपनी पसंद और इच्छा के अनुसार कपड़े पहनने का अधिकार कोई उनसे न छीने इसके लिए तो उन्हें लड़ना ही चाहिए, लेकिन उन्हें यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि यह सिर्फ कपड़े पहनने के अधिकार की लड़ाई ही बनकर न रह जाए। यह लड़ाई उस मानसिकता के ख़िलाफ लड़ी जाए जो महिलाओं का यौन-शोषण करने के किसी भी बहाने को सही ठहराती है, या उसे मनमानी करने का अधिकार देती है। यह लड़ाई उस मानसिकता के ख़िलाफ लड़ी जाए जो गाहे-बगाहे महिलाओं को दोषी ठहराते हुए या तो उनके कपड़े उतार देता है, या उन्हें सरे-आम पत्थर मारकर मार देता या फिर वहशी दरिंदों के समूह के रूप उसका सामूहिक बलात्कार करता है।
 
महिला इस तरह के कपड़े पहने तो उसका बलात्कार, अगर वह इस तरह के कपड़े नहीं पहने तो उसका बलात्कार, महिला घर में रहे तो उसका बलात्कार और अगर वह बाहर निकले तो उसका बलात्कार। लड़ाई इस मानसिकता के ख़िलाफ हो, लड़ाई नारीत्व के सम्मान के लिए हो, लड़ाई महिलाओं के अस्तित्व को साबित करने के लिए हो।

ध्यान यह भी रखना होगा कि लड़ाई ज़िद का रूप न ले, बेशर्मी मोर्चा के नाम पर केवल नए-लुभावने कपड़ों की परेड भर बनकर न रह जाए यह आंदोलन। यह आंदोलन तरह-तरह के कपड़े पहनने के अधिकार की ही लड़ाई बनकर न रह जाए।
 
कुल मिलाकर यह कि यह ‘बेशर्मी मोर्चा’ महिलाओं को ही शर्मिंदा न कर दे और शाब्दिक रूप से सचमुच ‘बेशर्मी मोर्चा’ बनकर न रह जाए यह इस आंदोलन के अगुवाओं को ध्यान में रखना होगा।

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20 जून 2013

Aug 16, 2012

ये बिल्कुल ग़लत हॅ...!आप जो राय दे रहे हो ..आप कभी देखे हो..? की इंदिरा.. मायबती.. शीला.. उनको छोटे से छोटे कपड़े पहेनटे हुए..? उनकी तो समाज मे बहुत इज़्ज़त करते है जनता.. तो इन्होने क्यूँ नही पहेनटे है.? उनको भी मालूम है की हमे हर चीज़ मॅ आज़ादी मिल चुकी है..तो फिर आम लोक ही क्या जाड़ा समझदार है..? बात करता है..!ये भगवान की किए करम है.. आप और हम कुछ भी नही कर सकते..!मन को बाँधा नही जा सकता ..कोई भी कितनी भी उँची खंडन का लड़का क्यूँ ना हो..लड़की अगर जिस्म दिखाए फिरे.. तो लड़का को कौन रोकेगा उसे छेड़ने से..! जब पेड़ मे फल पका हुआ दिखेंगे तो हमे खाने को मन तो करेगा ही ना...?पंडित जी इज़्ज़त हॅमेसा ढाकी हुई अच्छे लगते है..! जो चीज़ जितना जाडा देखोगे उतना ही उस बेजार होने का एहेसस होने लगे गा..! आई बात समझ मे..? बाकी खुस सोते बक्ट तारे गिनते हूए सोचते रहना..!मा बाप पूछतेहै तो लड़की ये जबाब देते है गाँधीजी घुटनोके उपर कपड़ा पहेनटे थे..और हम उन्ही की कदर करते हुए उनसे भी और दो हत उपर पेहेन्ते है..! या तो मा बाप सोचते है छोटे कपड़े कम पैसा से खरीदा होगा..लड़की हमारा पैसा बचत कर री है...! इसलिए हर दिन न्यूज़ पेपेर की फ्रंट पेज मे बलात्कार का न्यूज़ छापे होते है..!

ujjwal poyra west bengal

Aug 16, 2012

नग्नताअगर आज़ादी है तो हम जब आदीवाशी थे तो क्या ज़यादा आज़ाद थे आज़ादी की सही परिभासा ये तो नही है

kaal delhi

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