28 अगस्त 2012
इंडो एशियन न्यूज सर्विस
रामलाल जयन
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बांदा। बुंदेलखंड में सरकारी नियम-कानून का खौफ कम है और अंधविश्वासों का डर ज्यादा हावी है, यही वजह है कि वन विभाग की चौकसी के बाद भी विंध्य पर्वत श्रेणियों में पेड़ों का नामो निशान नहीं बचा। लेकिन मध्य प्रदेश की सरहद में बसे छतैनी गांव के एक पहाड़ की रखवाली उसमें विराजमान 'बिरौना बाबा' कर रहे हैं। लोगों की मान्यता है कि "पेड़ की डाल भी काटने से ग्राम देवता नाराज हो जाते हैं और वंश नाश कर देते हैं।"
'वृक्ष धरा का भूषण है, करता दूर प्रदूषण है' बुंदेलखंड में यह नारा वन विभाग और वन माफिया दोनों के लिए बेमतलब हो गया है। लगातार यह आरोप लगते रहे हैं कि वन विभाग के कर्मियों की सांठ-गांठ से वन माफिया जंगलों और पहाड़ों से कीमती पेड़ों की लकड़ी काटकर बेंच रहे हैं। कभी हरी-भरी रही बुंदेली धरती जहां अब सूखी और बंजर हो गई है, वहीं विंध्य श्रृंखला की पर्वत श्रेणियां वृक्ष विहीन हो चुकी हैं।
वन माफिया वन विभाग द्वारा बनाए गए नियम-कानून को तो नहीं डरे, परंतु मध्य प्रदेश की सरहद में बसे छतैनी गांव के एक पहाड़ की चोटी में विराजमान ग्राम देवता 'बिरौना बाबा' से बेहद घबराते हैं। अंधविश्वास का खौफ माफियाओं भर में ही नहीं समाया, गांव के ग्रामीण भी इस पहाड़ के वृक्षों की एक डाल काटने तक में डरते हैं। इसी खौफ से इस पहाड़ में सैकड़ों साल पुराने धवा, सहिजन, कापर, क्वासम, तेंदू, करघरी, शीशम, अर्जुन, सीताफल, आंवला व नीम के दरख्त पेड़ मौजूद हैं, दूर से देखने में यह पहाड़ घना बगीचा जैसा लगता है। इसी पहाड़ के बगल की पहाड़ी में एक भी कीमती पेड़ नहीं बचे हैं।
छतैनी गांव का बुजुर्ग बिसुंथा बताता है कि कई साल पहले एक लकड़ी ठेकेदार ने वनकर्मियों से मिलकर इस पहाड़ की लकड़ियां कटवा ली थी, लेकिन वह लकड़ी नहीं बेंच पाया और एक-एक कर परिवार के सभी सदस्यों की मौत मामूली बुखार से हो गई थी, जिसे ग्रामीणों ने 'बिरौना बाबा' का श्राप माना था।
इस घटना के बाद से पेड़ काटना दूर रहा, एक डाल तोड़ने तक से घबराते हैं। इसी गांव के रहने वाले पप्पू कुशवाहा बताते हैं कि मकर संक्रांति के त्योहार में बिरौना बाबा के मंदिर में भारी मेला लगता है, ग्रामीण शादी-ब्याह या किसी धार्मिक अनुष्ठान में अपने ग्राम देवता की पूजा करना नहीं भूलते।
ग्रामीण बताते हैं, "आस-पास की पहाड़ियों के पेड़ वन कर्मियों की मिली भगत से वन माफिया और गांव वाले अक्सर काटते रहते हैं, पर इस पहाड़ में बिरौना बाबा के खौफ के डर से एक दातून भी नहीं तोड़ी जाती।" वह बताते हैं, "दो दशक पहले सुखमन नामक ग्रामीण ने चोरी से कुछ लकड़ी काटकर बनाए गए अपने नए घर में लगा लिया था, वह गृह प्रवेश भी नहीं कर पाया और अचानक आग से पूरा घर जलकर राख हो गया था।"
यह दो घटनाएं ग्रामीणों में खौफ पैदा किए हुए हैं, यही वजह है कि बिना वन सुरक्षाकर्मियों के भी इस पहाड़ के सभी पेड़-पौधे वर्षो से सलामत हैं। इसी गांव का युवक जयराम का कहता है कि अंधविश्वास ही सही, कम से कम इस पहाड़ में हमेशा हरियाली तो बनी रहती है। वह बताता है कि आस-पास की पहाड़ियों में एक भी पेड़ नहीं बचे हैं और बिरौना बाबा के डर की वजह से यहां हजारों पेड़ मौजूद हैं।
ग्रामीणों की मानें तो फल-फूल के इस्तेमाल से ग्राम देवता नहीं नाराज होते, सिर्फ पेड़ काटने से नुकसान होता है। जिला वनराज अधिकारी (डीएफओ) बांदा नूरुल हुदा ने बताया कि इस पहाड़ की रखवाली में किसी वन कर्मी की तैनाती नहीं है, ग्रामीणों और लकड़ी चोरों में ग्राम देवता का इतना खौफ है कि वर्षों से एक भी डाल नहीं कटी है।
गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) कृषि एवं पर्यावरण विकास संस्थान के निदेशक सुरेश रैकवार का कहना है कि कई मामलों में अंधविश्वास लोगों को फायदेमंद साबित हुआ है, अगर इस पहाड़ से ग्राम देवता की मान्यता न जुड़ी होती तो यह भी अन्य पहाड़ों की भांति उजड़ गया होता।
वह कहते हैं, "जंगल और पहाड़ प्राकृतिक धरोहर हैं, इनकी सुरक्षा करना समाज के हर वर्ग की जिम्मेदारी बनती है।"
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