11 अगस्त 2012
इंडो एशियन न्यूज सर्विस
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झारखंड। झारखण्ड के गोड्डा जिले के धरमा पहाड़िया को स्वतंत्रता दिवस का मतलब पता नहीं है। वह इस खास दिन पर शायद न तो झंडा फहराए और न ही राष्ट्रगान गाए। सम्भवत: आज तक उसने 15 अगस्त को मनाए जाने वाले स्वतंत्रता दिवस के दौरान होने वाला ध्वजारोहण नहीं देखा है। वह कभी ऐसे समारोह को देख पाएगा, इसकी उम्मीद भी फिलहाल कम ही दिखती है।
ऐसा नहीं है कि धरमा देशभक्त नहीं है। पर छह साल का यह मासूम इतनी बुरी तरह कुपोषित है कि किसी दूसरी चीज की तरफ ध्यान देना भी उसके लिए सम्भव नहीं। वह दिन में दो बार मुट्ठी भर चावल थोड़े से नमक के साथ खाता है। उसकी उम्र में बच्चों के शरीर को प्रतिदिन 1715 कैलोरी की आवश्यकता होती है, लेकिन हर रोज इस नाम मात्र के भोजन से उसे केवल 440 कैलोरी ही मिलती है। नतीजन धरमा बहुत कमजोर है और मलेरिया तथा कालाजार जैसी बीमारियों से उसके पीड़ित होने की आशंका दूसरे बच्चों की तुलना में कहीं अधिक है। अपनी उम्र के दूसरे बच्चों की तुलना में धरमा के लिए जिंदा रहना कहीं अधिक मुश्किल है।
वर्ष 1947 में आजादी से पूर्व जितने भारतीय भूखे पेट सोने को मजबूर थे, आज उससे कहीं अधिक भारतीय भोजन से वंचित हैं। हमारे देश में 20 करोड़ से अधिक लोगों को भरपेट भोजन नहीं मिलता है। दुनिया में खाद्य असुरक्षा से पीड़ित सबसे ज्यादा लोग हमारे ही देश में हैं। वयस्कों की भूख की समस्या का निदान न होने से इसका सीधा असर बच्चों पर भी पड़ता है। भारत में लगभग 50 प्रतिशत बच्चे कुपोषण की समस्या से ग्रस्त हैं।
कुपोषण के कारण इन बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास बुरी तरह प्रभावित होता है। इससे शिशु मृत्यु दर में तेजी से इजाफा होता है। कुपोषण का असर बचपन में स्कूल के मैदान से लेकर कक्षा में पढ़ाई के दौरान बच्चे की कमजोर क्षमताओं के रूप में सामने आता है। बचपन के कुपोषण का असर बालिग होने पर कमजोर कार्यक्षमता के रूप में सामने आता है। बचपन में भूख और कुपोषण बड़े होने पर कमजोर कार्यक्षमता के कारण आजीविका के संकट को जन्म दे सकते हैं।
रोशनी उस समय बच्ची थी जब उसके परिवार को बिना मुआवजे के जमीन छोड़कर विस्थापित होना पड़ा। रोशनी का परिवार वर्षों से जंगल में इस जमीन के टुकड़े पर खेती कर रहा था। लेकिन अचानक हुए विस्थापन के बाद उसके पिता के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी परिवार के 10 सदस्यों के लिए दो वक्त के भोजन का इंतजाम करना। उनके पास आजीविका का कोई साधन न था। नतीजा यह था कि भारी कुपोषण की शिकार रोशनी को मौत के मुंह से बचाने के लिए सरकार द्वारा संचालित पोषण पुनर्वास केंद्र (न्यूट्रीशन रीहेबिलिटेशन सेंटर) में भर्ती करवाना पड़ा। इस केंद्र पर कुपोषण के कारण मौत के कगार पर पहुंच गए बच्चों को बचाने के लिए 15 दिनों का एक विशेष कार्यक्रम चलाया जाता है।
बच्चों द्वारा अपने लिए भोजन का अधिकार सुनिश्चित करना सम्भव नहीं है। ऐसे में अगर माता-पिता के पास अपने बच्चों को पोषक आहार देने की क्षमता का अभाव हो तो बच्चों को उचित पोषण उपलब्ध करवाना समाज और अंतत: सरकार की जिम्मेदारी बन जाती है।
पिछले कुछ वर्षो से ‘खाद्य सुरक्षा’ का विषय खूब चर्चा में रहा है। इसके बावजूद बहुत कम लोग इसकी अवधारणा और इसके सही अर्थ को समझते हैं। खाद्य सुरक्षा का अर्थ ऐसी स्थिति से है, जिसमें सभी नागरिकों को हर समय पर्याप्त खाद्य सामग्री उपलब्ध हो और उनमें सम्मानपूर्वक उसे प्राप्त करने की क्षमता हो। लेकिन यहां यह स्पष्ट कर देना उचित होगा कि खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने का अर्थ पोषण सुरक्षा सुनिश्चित होना नहीं है। अब तक हम पोषण सुरक्षा उपलब्ध करवाने के लिए कई योजनाएं चला चुके हैं, जिनके केंद्र में मुख्य रूप से उचित मात्रा में कैलोरी उपलब्ध करवाने के प्रयास हैं। लेकिन ये खास सफल नहीं हो पाईं।
अब नीति-निर्माताओं को जल्दी परिणाम चाहिए। कुपोषण की समस्या का निदान अब उन्हें खाद्य सुरक्षा विधेयक में नजर आता है। जल्दी से जल्दी परिणाम हासिल करने के लिए अब हर तरह की योजनाएं अपनाई जा रही हैं। इसलिए अब ज्यादातर सरकारी खाद्य कार्यक्रमों में ज्यादा जोर गेहूं, चावल तथा इसके कुछ खास पोषक तत्वों (माइक्रोन्यूट्रिशंस) को बांटने पर है, ताकि कैलोरी के अंतर को कम किया जा सके। लेकिन सिर्फ कैलोरी के अंतर को पाट देने से कुपोषण की इस गम्भीर समस्या का निदान नहीं होगा, जिसका सामना बच्चों की हमारी मौजूदा पीढ़ी कर रही है।
यह एक गैर-व्यावहारिक और निष्प्रभावी सोच है कि कैलोरी के अंतर को पाट देने से कुपोषण की समस्या स्थाई रूप से सुलझ जाएगी। कुपोषण की समस्या के स्थाई समाधान के लिए हमें एक समग्र खाद्य सुरक्षा विधेयक संसद में लाना होगा, जो उचित मात्रा में कैलोरी उपलब्ध करवाने के साथ ही आवश्यक पोषक तत्वों की सुनिश्चितता भी उपलब्ध करवाए। लेकिन केंद्र सरकार द्वारा संसद के मानसून सत्र में पेश किया जाने वाला खाद्य सुरक्षा विधेयक अपने मौजूदा स्वरूप में दोनों कसौटियों पर खरा नहीं उतरता।
धरमा और रोशनी जैसे बच्चों को एक ऐसे समग्र खाद्य सुरक्षा विधेयक की जरूरत है, जो उन्हें प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, विटामिन और खनिज का उचित संतुलन उनके आाहार में उपलब्ध करवा सके। उन्हें अपने घर के निकट एक ऐसे आंगनवाड़ी केंद्र की जरूरत है, जो छह साल की उम्र तक उन्हें पोषक आहार उपलब्ध करवा सके। उन्हें जरूरत है एक ऐसी योजना की, जिससे स्कूलों में उन्हें पोषक और सही मात्रा में दोपहर का भोजन मिल सके।
उन्हें अपने पड़ोस में भ्रष्टाचार मुक्त सार्वजनिक वितरण प्रणाली की ऐसी दुकान की जरुरत है, जो उनके माता-पिता को उचित दाम पर गुणवत्तापूर्ण खाद्यान्न उपलब्ध करवाए। धरमा और रोशनी को जरूरत है कृषि व रोजगार क्षेत्र में स्थाई विकास सुनिश्चित करने वाली नीतियों के क्रियान्वयन की, जिससे उनके माता-पिता की आजीविका सुनिश्चित हो सके। इसके बगैर कोई भी खाद्य सुरक्षा विधेयक केवल लक्षणों का निदान कर पाएगा, बीमारी का नहीं।
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