22 मई 2012
ईश्‍वर का चमत्‍कार, 25 साल बाद लौटा बिछड़ा बेटा
14 फरवरी 2012
वार्ता

खंडवा (म.प्र)।
अब इसे ऊपर वाले का चमत्कार कहे या किस्मत का खेल ‘कभी रेलगाड़ियों में झाडू लगाकर भीख मांगने वाले बच्चे शेरू की तकदीर ने ऐसी करवट ली कि घर से बिछड़कर वह ऑस्ट्रेलिया कि एक करोड़पति दंपत्ति के घर गोद चला गया 25 साल में उसने वह सब कुछ पाया जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी लेकिन बस कमी थी तो सिर्फ अपनी मां की और मां की यही ममता ही उसे सात समंदर पार के महलों से अपने झोपडे़ में खींच लाई। इधर अचानक अपने बेटे को सामने पाकर मां को तो जैसे दुनिया की सारी दौलत मिल गयी है।

खंडवा के गणेशतलाई क्षेत्र की गरीब बस्ती में फिल्मों की तर्ज पर हुए इस वाकये ने सबको अचंभे में डाल दिया।  हुआ यूं कि फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाला एक विदेशी युवक महंगा मोबाइल हेंडसेट और एक पुरानी तस्वीर हाथ में लिए फातमा बी यानी अपनी मां का घर ढूंढ रहा था। उस युवक और फातमा का क्या सम्बन्ध है यह किसी को भी समझ नहीं आया। इस बीच लोगो ने उसे फातमा के घर पहुंचा दिया।

जैसे ही मां आमने-सामने हुए पच्चीस साल पहले बिछडे़ बच्चे ने अपनी मां को तुरंत पहचान लिया वहीं मां को भी अपने कलेजे के टुकडे़ को पहचानने में कोई देर नहीं लगी। इस घर में ही नहीं पूरे मोहल्ले में खुशियों का सैलाब उमड़ पड़ा आस पड़ोस के लोगो का फातमा को बधाई देने वालों का तांता लग गया वहीं लोग सारू उर्फ शेरू को पाकर ढोल कि थाप पर नाचने लगे।

मां कमला उर्फ फातमा का कहना है कि हमारे दिन बहुत गरीबी में गुजरे बच्चे भीख मांगकर खाते थे,  बड़ा लडका ट्रेन से कट गया और छोटा ट्रेन से कहां गया पता नहीं चला उसे बहुत ढूंढा हम उम्मीद खो चुके थे। यह तो ऊपर वाले की ही मेहरबानी है कि बेटा इतने साल बाद भी लौट आया। लगता है सारी नेमत सारी दुनिया की दौलत मुझे मिल गयी है।

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दरअसल सारा मामला किसी मसालेदार हिंदी फिल्मो से कम नहीं है। आज से करीब पच्चीस साल पहले शेरू अपने बडे़ भाई गुड्डू के साथ ट्रेन में झाडू लगाने और भीख मांगने के लिए चढाता था, उसके पिता मुंशी खान ने उसकी मां कमला उर्फ फातमा को बच्चों सहित छोड़ दिया था, बेहद गरीबी में बच्चे ही भीख मांगकर परिवार का पेट पाल रहे थे।

ट्रेन में शेरू को पता नहीं कब झपकी लग गयी और नींद में वह कलकत्ता चला गया इधर उसका बड़ा भाई गुड्डू बुरहानपुर के पास कब ट्रेन से गिरकर कट गया उसे पता भी नहीं चला। शेरू को कलकत्ता में नवजीवन नामक संस्था ने नया जीवन दिया उसे कुछ दिन वहां रखने के बाद ऑस्ट्रेलिया की एक करोड़पति संतानहीन दंपत्ति को गोद दे दिया। उसका नाम शेरू से सारू ब्रिएर्ले हो गया।

केनबेरा युनिवेर्सिटी से ग्रेजुएट होने के बाद सारू ने अपने पिता जॉन ब्रिएर्ले की ही अेग्रोबेस इंडस्ट्री का कामकाज संभाला। सारू उर्फ शेरू ने बताया कि मैं अपने भाई के साथ बुरहानपुर गया था वो ट्रेन से स्लिप हो गया और में कलकत्ता पहुंच गया। वहां नवजीवन नामक संस्था उसे कुछ दिन वहां रखने के बाद ऑस्ट्रेलिया की एक संतानहीन दंपत्ति को गोद दे दिया। वहीं पला बढ़ा लेकिन मां की याद सताती थी। खंडवा की यादें दिमाग में बराबर बनी थी। मैंने गूगल पर खंडवा को खोजा अपनी मां और परिवार से मिलकर अच्छा लगा। यह यकीनन उपरवाले का चमत्कार ही है जिसने मेरे जीवन में ऐसे रंग भरे। भाई कल्लू का कहना है कि हम भाई को खोजने हर जगह गए मजार और देवी देवताओं के द्वार गए सभी जगह से यही बात कहीं गयी की वो लौट के जरूर आएगा और आखिर में वह बात सच साबित हुई।

सारू के पास सुख सुविधाओ की कोई कमी नहीं है उसका आलिशान बंगला है महंगी निस्सान कार है और ब्रिएर्ले दंपत्ति का भरपूर प्यार भी फिर भी मां से मिलाने की छटपटाहट उसे खंडवा खींच ही लाई। परिवार की खस्ता हालत देख उसे दुःख भी हुआ लेकिन वह अब उनकी मदद करने को तत्पर है। इधर अपने कलेजे के टुकडे़ को खो चुकी मां की तो मानो और सारी मुराद पूरी हो गयी सारी दुनिया की दौलत उसे मिल गयी।

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