07 जनवरी 2013
आईबीएन 7
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नई दिल्ली। हाड़ कंपा रही इस ठंड की तीक्षणता में शनिदेव का भी खासा योगदान है। इन दिनों शनिदेव उच्च राशि तुला में गति मान हैं। यहां इनकी उपस्थिति इन्हें प्रसन्नता और बल प्रदान करती है। पाश्चात्य ज्योतिष के अनुसार 20 दिसंबर से 19 फरवरी तक शनि की दोनों राशियों मकर और कुंभ का समयकाल होता है। सामान्यतः सूर्य राशि के अनुसार 20 दिसंबर से 19 जनवरी तक मकर राशि का समयकाल रहता है। 20 जनवरी से 19 फरवरी तक कुंभ राशि का समयकाल होता है। ठंड का अधिकांश प्रभाव इन्हीं दो माह में रहता है। वर्तमान में इन राशियों के स्वामी शनिदेव भी अपनी उच्च राशि में गतिमान हैं।
शनि का उच्च राशि में होना अधिक सर्दी का कारण
उच्च राशि में रहने से शनि इन दिनों अत्यधिक प्रभावशाली बने हुए हैं। शनि की यह प्रभावशीलता भी सर्दी की तीव्रता को बढ़ा रही है। ज्योतिषीय अनुमान है कि इस बार सर्दी देर तक बनी रहेगी। साथ ही इसका तीखापन भी अधिक रहेगा। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि शनिदेव तीस साल में सभी 12 राशियों पर भ्रमण कर पाते हैं। इनकी धीमी गति के कारण ही इन्हें शनिश्चर कहा जाता है।
शनि रोग का कारक भी
शनि रोग का कारक बनता हो, जो जातक को लम्बे समय तक पीड़ित रखता है। यह और एक दर्द भी है कि राहु जब किसी रोग का जनक होता है, तो बहुत समय तक तो उस रोग की जांच (डायग्नोसिस) ही नहीं हो पाती है। डॉक्टर यह समझ ही नहीं पाता है कि जातक को क्या बीमारी है? और ऐसी स्थिति में रोग अपेक्षाकृत अधिक अवधि तक चलता है।
लंबी बीमारी में शनि की प्रबल भूमिका
प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में कभी न कभी रोगों से अवश्य पीड़ित होता है। कुछ व्यक्ति कुछ विशेष समय में अथवा माह में ही प्रतिवर्ष बीमार हो जाते है। ये सभी तथ्य प्रायः जन्मप्रत्रिका में ग्रहों की भागवत एवं राशिगत स्थितियों और दशा, अन्तर्दशा पर निर्भर करते हैं। इसके अतिरिक्त कई बीमारियां ऐसी हैं, जो होने पर बहुत कम दुष्प्रभाव डाल पाती हैं, जबकि कुछ बीमारियां ऐसी हैं, जो जब भी जातक विशेष को होती हैं, तो बहुत नुकसान पहुंचाती है। कई बार ऐसा स्थिति उत्पन्न होती है कि बीमारी होती तो हैं लेकिन उसकी पहचान भली प्रकार से नहीं हो पाती है। उन सभी प्रकार के तथ्यों का पता जातक की कुंडली को देखकर लगाया जा सकता है। आज हम लोग कुंडली से पता लगने वाले रोगों की चर्चा करेंगे।
कुंडली में लग्न भाव स्वयं का प्रतिनिधित्व करता है। यह एक प्रकार से सम्पूर्ण शरीर को दर्शाता है। षष्ठ भाव रोगों को दर्शाता है और अष्टम भाव आयु का प्रतीक होता है। इस प्रकार इन तीनों भावों का ही इस संबंध में प्रमुखता से विचार किया जाता है।
कब होगी रोग मुक्तिः
किसी भी रोग से मुक्ति रोगकारक ग्रह की दशा अन्तर्दशा की समाप्ति के पश्चात ही प्राप्त होती है। इसके अतिरिक्त यदि कुंडली में लग्नेश की दशा अन्तर्दशा प्रारम्भ हो जाए, योगकारक ग्रह की दशा अन्तर्दशा प्रत्यन्तर्दशा प्रारम्भ हो जाए, तो रोग से छुटकारा प्राप्त होने की स्थिति बनती हैं। शनि यदि रोग का कारक बनता हो, तो इतनी आसानी से मुक्ति नही मिलती है,क्योकि शनि किसी भी रोग से जातक को लम्बे समय तक पीड़ित रखता है और राहु जब किसी रोग का जनक होता है, तो बहुत समय तक उस रोग की जांच नही हो पाती है। डॉक्टर यह समझ ही नहीं पाता है कि जातक को बीमारी क्या है और ऐसे में रोग अपेक्षाकृत अधिक अवधि तक चलता है।
उत्तर भारत में सर्दी का सितम, कहीं 1 डिग्री तो कहीं पारा शून्य से नीचे
लंबी बीमारी में शनि की प्रबल भूमिका!
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