22 मई 2012
गया में लावारिस जानवरों का कब्रिस्तान!
07 जनवरी 2012
इंडो एशियन न्‍यूज सर्विस
मनोज पाठक

पटना।
आज तक आपने मृत लोगों के लिए कब्रिस्तान के विषय में सुना और देखा होगा लेकिन बिहार के गया में एक ऐसा कब्रिस्तान भी है जहां लावारिस कुत्तों सहित अन्य जानवरों के मरने के बाद न केवल उनका नामकरण किया जाता है बल्कि उसे इज्जत के साथ कब्रिस्तान में दफनाया भी जाता है। कब्र पर जानवर के नाम की नेमप्लेट और फोटो भी लगाई जाती है।

भगवान बुद्ध की ज्ञानस्थली बोधगया मे इतालवी मूल की महिला एड्रिआना फेरेंटी ने जानवरों से प्रेम की अनोखी मिसाल पेश की हैं। पिछले 25 साल में लगभग 500 मृत जानवरों को वह कब्रिस्तान में दफना चुकी हैं।

वह जब कभी बोधगया की सड़कों पर भ्रमण करने निकलती हैं तो सड़कों के किनारे पड़े लावारिस एवं घायल कुत्तों, बकरियों, मुर्गो, घोड़ों, खरगोश आदि जानवरों को देखकर बहुत दुखी हो जाती हैं। उनके जेहन में यही ख्याल आता है कि अगर ये इंसान होते तो अपनी परेशानियों और दुखों को बता सकते थे लेकिन ये बेजुबान हैं इसलिए अपनी तकलीफ और पीड़ा कहें भी तो कैसे।

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जानवरों की पीड़ा से भावुक होकर एड्रिआना उन सारे जानवरों को ले आती हैं और उनका टीकाकरण सहित उचित उपचार करके उन्हें अपने पास रख लेती हैं।

एड्रिआना ने आईएएनएस को बताया कि वर्तमान समय में उनके पास 98 कुत्ते, 49 बकरियां, छह मुर्गे, चार खरगोश तथा एक घोड़ा हैं। जिन्हें सुबह और शाम दो वक्त का खाना और आश्रय की व्यवस्था की गई है।

बौद्ध धर्म अपना चुकीं एड्रिआना का मानना है कि बुद्ध के मैत्री, करुणा और प्रेम के संदेश से उनके जीवन में बदलाव आया है। उनकी सोच यह है कि आखिर जानवर भी इंसानों की तरह एक प्राणी हैं, जो हमारे समाज के बीच रहते हैं लेकिन इंसान अपने काम के लिए इन जानवरों को पालता है जिनमें उसका स्वार्थ निहित होता है।

वह कहती हैं कि वह ऐसे ही जानवरों के मर जाने के बाद उन्हें बौद्ध परम्परा के अनुसार दफना देती हैं ताकि उनकी आत्मा की शांति मिल सके। इसी सोच को लेकर वह जानवरों का कब्रिस्तान बना चुकी हैं। इस कब्रिस्तान में अब तक 500 जानवरों को दफनाया जा चुका है। वह कहती हैं कि मृत जानवरों की कब्र के ऊपर उनकी फोटो, नाम, जन्मतिथि, मरने की तिथि अंकित की जाती है। एड्रिआना करीब 25 साल से इसी तरह मृत जानवरों को दफनाती आ रही हैं।

एड्रियाना ने बोधगया के धंधवा गांव में जानवरों की देखभाल के लिए आश्रम बना रखा है, जिसका नाम मैत्री चैरिटेबल ट्रस्ट हैं। जानवरों की देखभाल के लिए यहां कई कर्मचारी हैं।

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कर्मचारी बताते हैं कि यहां कई तरह के जानवर हैं, जिनकी देखभाल इंसानों की तरह की जाती है। सभी जानवरों को वक्त पर भोजन दिया जाता हैं। इसके अलावा जब लावारिस जानवरों को यहां लाया जाता हैं तो उनके यहां आने के दिन से लेकर उनके मरने तक के प्रत्येक दिन की दिनचर्या का लेखा-जोखा रजिस्टर में दर्ज किया जाता है।

इस आश्रम में जानवरों का इलाज करने वाले चिकित्सक सुरेश प्रसाद बताते हैं कि जानवरों की तबीयत खराब होने पर वे उनका इलाज करते हैं। इसके अलावा आसपास के गांवों के लोग भी अपने जानवरों को यहां इलाज के लिए लाते हैं उनका भी इलाज किया जाता है और दवा दी जाती है।

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