13 फरवरी 2012
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस
राधिका भिरानी
नई दिल्ली। फिल्मों और टेलीविजन पर आने वाली धारावाहिकों का बाल मन पर कितना बुरा प्रभाव पड़ता है, इसका पता हाल की दो घटनाओं से चलता है। टीवी धारावाहिक में दिखलाए गए आत्महत्या के दृश्य की नकल करते हुए एक 12 वर्षीय बच्चे ने अपनी जान ले ली, जबकि दूसरी घटना में एक 15 वर्षीय बच्चे ने अपनी शिक्षिका की चाकू मारकर हत्या कर दी।
पता चला है कि 15 वर्षीय बच्चे ने फिल्म ‘अग्निपथ’ देखी थी। विशेषज्ञ हालांकि सिनेमा और टीवी धारावाहिक के साथ-साथ दूसरे कुछ कारणों को भी इसके लिए जिम्मेदार मानते हैं।
बाल मनोचिकित्सक समीर पारिख ने कहा कि बच्चों में साक्षरता फैलाने के लिए मीडिया एक रास्ता है।
वीडियो गेम्स बना सकते हैं आक्रामक
पारिख ने आईएएनएस से कहा, "शिक्षा प्रणाली में मीडिया साक्षरता को भी शामिल किए जाने की जरूरत है, ताकि बच्चे वास्तविक दुनिया और काल्पनिक दुनिया के भेद को समझ सकें।"
उन्होंने कहा, "बच्चे जब पर्दे पर हिंसा देखते हैं, तो उनमें आक्रामकता आने लगती है। वे आक्रामता के प्रति असंवेदनशील हो जाते हैं। सच्चाई के प्रति उनकी धारणा बदल जाती है और वे समझने लगते हैं कि हत्या करना या गाली बकना कोई बड़ी बात नहीं है। यहीं से समस्या शुरू हो जाती है।"
चेन्नई के जिस बच्चे ने कथित रूप से उसे अच्छा प्रदर्शन नहीं करने के कारण डांट लगाने वाली शिक्षिका की हत्या कर दी, उसके बारे में पता चला कि उसने पुलिस को हाल ही में फिल्म ‘अग्निपथ’ देखने की बात बताई। वह फिल्म के हीरो से प्रभावित था, जिसने अपने पिता को बदनाम करने वाले से बदला लिया था।
बच्चों को सजा बना सकती हैं आक्रामक
दिल्ली में भी एक बच्चे ने कुर्सी पर कुर्सी जोड़कर दुपट्टे के सहारे खुद को फांसी लगा ली। उसके पिता का मानना है कि उसने हाल में दिखाए गए एक धारावाहिक की नकल की होगी, जिसमें एक नायिका ने इसी प्रकार से आत्महत्या की थी।
एक लोकप्रिय धारावाहिक सी.आई.डी. के निर्माता बी.पी. सिंह हालांकि कहते हैं कि यह कहना पूरे तौर पर सही नहीं है कि फिल्म बच्चों को अपराध के लिए उकसाते हैं।
उन्होंने मुम्बई से फोन पर आईएएनएस से कहा कि इसके लिए शिक्षा व्यवस्था को दोषी ठहराया जा सकता है, जो एक बच्चे से काफी अधिक उम्मीदें लगाए रखता है।
सिंह ने कहा कि निर्माता कभी नकारात्मक तरीके से प्रभावित करना नहीं चाहते हैं।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस
राधिका भिरानी
नई दिल्ली। फिल्मों और टेलीविजन पर आने वाली धारावाहिकों का बाल मन पर कितना बुरा प्रभाव पड़ता है, इसका पता हाल की दो घटनाओं से चलता है। टीवी धारावाहिक में दिखलाए गए आत्महत्या के दृश्य की नकल करते हुए एक 12 वर्षीय बच्चे ने अपनी जान ले ली, जबकि दूसरी घटना में एक 15 वर्षीय बच्चे ने अपनी शिक्षिका की चाकू मारकर हत्या कर दी।
पता चला है कि 15 वर्षीय बच्चे ने फिल्म ‘अग्निपथ’ देखी थी। विशेषज्ञ हालांकि सिनेमा और टीवी धारावाहिक के साथ-साथ दूसरे कुछ कारणों को भी इसके लिए जिम्मेदार मानते हैं।
बाल मनोचिकित्सक समीर पारिख ने कहा कि बच्चों में साक्षरता फैलाने के लिए मीडिया एक रास्ता है।
वीडियो गेम्स बना सकते हैं आक्रामक
पारिख ने आईएएनएस से कहा, "शिक्षा प्रणाली में मीडिया साक्षरता को भी शामिल किए जाने की जरूरत है, ताकि बच्चे वास्तविक दुनिया और काल्पनिक दुनिया के भेद को समझ सकें।"
उन्होंने कहा, "बच्चे जब पर्दे पर हिंसा देखते हैं, तो उनमें आक्रामकता आने लगती है। वे आक्रामता के प्रति असंवेदनशील हो जाते हैं। सच्चाई के प्रति उनकी धारणा बदल जाती है और वे समझने लगते हैं कि हत्या करना या गाली बकना कोई बड़ी बात नहीं है। यहीं से समस्या शुरू हो जाती है।"
चेन्नई के जिस बच्चे ने कथित रूप से उसे अच्छा प्रदर्शन नहीं करने के कारण डांट लगाने वाली शिक्षिका की हत्या कर दी, उसके बारे में पता चला कि उसने पुलिस को हाल ही में फिल्म ‘अग्निपथ’ देखने की बात बताई। वह फिल्म के हीरो से प्रभावित था, जिसने अपने पिता को बदनाम करने वाले से बदला लिया था।
बच्चों को सजा बना सकती हैं आक्रामक
दिल्ली में भी एक बच्चे ने कुर्सी पर कुर्सी जोड़कर दुपट्टे के सहारे खुद को फांसी लगा ली। उसके पिता का मानना है कि उसने हाल में दिखाए गए एक धारावाहिक की नकल की होगी, जिसमें एक नायिका ने इसी प्रकार से आत्महत्या की थी।
एक लोकप्रिय धारावाहिक सी.आई.डी. के निर्माता बी.पी. सिंह हालांकि कहते हैं कि यह कहना पूरे तौर पर सही नहीं है कि फिल्म बच्चों को अपराध के लिए उकसाते हैं।
उन्होंने मुम्बई से फोन पर आईएएनएस से कहा कि इसके लिए शिक्षा व्यवस्था को दोषी ठहराया जा सकता है, जो एक बच्चे से काफी अधिक उम्मीदें लगाए रखता है।
सिंह ने कहा कि निर्माता कभी नकारात्मक तरीके से प्रभावित करना नहीं चाहते हैं।
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