03 मार्च 2012
वार्ता
गोरखपुर। उर्दू के प्रसिद्ध शायर रघुपति सहाय फिराक ने एक बार कहा था-
‘हासिंले जिन्दगी तो कुछ यादें हैं।
याद रखना फिराक को यारों।’
लेकिन गोरखपुर अपने इस लोकप्रिय शायर को भूलता जा रहा है। फिराक साहब गोरखपुर में पैदा हुए, यहीं के हैं मगर अब इस शहर में उनका कुछ भी नहीं है।
गोरखपुर-लखनऊ राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 28 पर गोरखपुर में ज्यों ही बायें तरफ नीचे उतरिए तो एक सड़क रावत पाठशाला होते हुए घंटाघर की तरफ जाती है। इसी पाठशाला के करीब वह लक्ष्मी भवन है जिसमें फिराक ने आंखे खोली थी और यही रावत पाठशाला है जहां उन्होंने शिक्षा आरम्भ की थी।
लक्ष्मी भवन उनके जिन्दगी में बिक गया था और अब फिराक के नाम पर इस शहर में न तो पार्क है और न ही भवन और न कोई शिक्षण संस्थान । बस एक चौराहे पर उनकी प्रतिमा लगी हुयी है जिससे लगता है कि शहर से इस शायर का कोई रिश्ता था।
फिराक ।898 में पैदा हुए थे और तीन मार्च ।982 को उनका स्वर्गवास हुआ था। उन्होंने आई.सी.एस. की नौकरी छोडकर और महात्मा गांधी से प्रभावित होकर आजादी की लड़ाई में भाग लिया।
उनके पिता ईश्वरीय प्रसाद बड़ॆ वकील थे और पंडित जवाहर लाल नेहरू उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानते थे।
फिराक उच्च शिक्षा के लिए इलाहाबाद गये और वहां आनन्द भवन के सम्पर्क में आये। उन्होंने स्वंत्रतता आन्दोलन में हिस्सा लिया तो घर की आर्थिक स्थिति बिगडने लगी। पंडित नेहरू को उनकी स्थिति को भांपने में देर नहीं लगी। उन्होंने फिराक साहब को कांग्रेस कार्यालय का सचिव बना दिया लेकिन उन्हें तो साहित्य की दुनिया में अपना नाम रोशन करना था। इसीलिए साहित्य सृजन के क्रम को उन्होंने जारी रखा। वह पहले कानपुर फिर आगरा के एक महाविद्यालय में अंग्रेजी के प्रवक्ता नियुक्त हुए और बाद में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफेसर बने।
फिराक और हिन्दी के कवि हरिवंश राय बच्चन में एक समानता थी। दोनों इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के शिक्षक थे। श्री बच्चन यदि हिन्दी में लिखते थे तो फिराक साहब का शौक ऊर्दू लेखन था। अंग्रेजी भाषा के भरपूर ज्ञान, भारतीय संस्कृति और संस्कृत साहित्य की अच्छी समझ, गीता के दर्शन और उर्दू भाषा से लगाव ने फिराक को हिमालय बना दिया।
फिराक ने उर्दू गजल और शायरी को उस नाजुक वक्त में नयी जिन्दगी दी जब लग रहा था कि नारेबाजी और खोखली शायरी गजल की प्रासंगिकता को समाप्त कर देगी। लेकिन उन्होंने गजल में आम हिन्दुस्तानी का दर्द भर दिया। तभी वह कह सके-
“कहां का दर्द भरा था, तेरे फंसाने में
फिराक दौड गयी सह सी जमाने मे
शिव का विषपान सुना होगा मैं भी ऐ दोस्त
रात पी गया आंसू इस दौर में
जिन्दगी बसर की बीमार की रात हो गयी”
फिराक ने उर्दू साहित्य को उस जगह लाकर खड़ा कर दिया जो दुनिया की अन्य भाषाओं से काफी आगे नजर आता है। वह आवाज जिसमें एक जादू था खामोश हो गयी। लेकिन फिराक ने जिस आवाज को मर मर कर पाला था वह आज भी साहित्य की दुनिया में सुनायी दे रही है।
उन्होंने लिखा-
“मैंने इस आवाज को मर-मर कर पाला है
फिराक आज जिसकी नर्म लव है समय मेहरावे हयात”
फिराक को ज्ञानपीठ समेत कई पुरस्कारों से नवाजा गया लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ चिकित्सक अजीज अहमद का मानना है कि उन्हें भारत रत्न मिलना चाहिए और गोरखपुर स्थित दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्व विद्यालय में उनके नाम पर एक शोधपीठ भी गठित होनी चाहिये।
शहर के दाउदपुर चौराहे पर कुछ वर्षों पूर्व उनकी एक भव्य मूर्ति स्थापित करायी गयी थी। लगातार जाम लगे रहने के कारण उस मूर्ति के आस पास लगी ग्रिल को तोडकर इसका घेरा छोटा कर दिया गया है। सिर्फ ग्रिल ही छोटी नहीं हुई बल्कि फिराक से जुडी यादों का दायरा भी सिमटता चला गया।
वार्ता
गोरखपुर। उर्दू के प्रसिद्ध शायर रघुपति सहाय फिराक ने एक बार कहा था-
‘हासिंले जिन्दगी तो कुछ यादें हैं।
याद रखना फिराक को यारों।’
लेकिन गोरखपुर अपने इस लोकप्रिय शायर को भूलता जा रहा है। फिराक साहब गोरखपुर में पैदा हुए, यहीं के हैं मगर अब इस शहर में उनका कुछ भी नहीं है।
गोरखपुर-लखनऊ राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 28 पर गोरखपुर में ज्यों ही बायें तरफ नीचे उतरिए तो एक सड़क रावत पाठशाला होते हुए घंटाघर की तरफ जाती है। इसी पाठशाला के करीब वह लक्ष्मी भवन है जिसमें फिराक ने आंखे खोली थी और यही रावत पाठशाला है जहां उन्होंने शिक्षा आरम्भ की थी।
लक्ष्मी भवन उनके जिन्दगी में बिक गया था और अब फिराक के नाम पर इस शहर में न तो पार्क है और न ही भवन और न कोई शिक्षण संस्थान । बस एक चौराहे पर उनकी प्रतिमा लगी हुयी है जिससे लगता है कि शहर से इस शायर का कोई रिश्ता था।
फिराक ।898 में पैदा हुए थे और तीन मार्च ।982 को उनका स्वर्गवास हुआ था। उन्होंने आई.सी.एस. की नौकरी छोडकर और महात्मा गांधी से प्रभावित होकर आजादी की लड़ाई में भाग लिया।
उनके पिता ईश्वरीय प्रसाद बड़ॆ वकील थे और पंडित जवाहर लाल नेहरू उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानते थे।
फिराक उच्च शिक्षा के लिए इलाहाबाद गये और वहां आनन्द भवन के सम्पर्क में आये। उन्होंने स्वंत्रतता आन्दोलन में हिस्सा लिया तो घर की आर्थिक स्थिति बिगडने लगी। पंडित नेहरू को उनकी स्थिति को भांपने में देर नहीं लगी। उन्होंने फिराक साहब को कांग्रेस कार्यालय का सचिव बना दिया लेकिन उन्हें तो साहित्य की दुनिया में अपना नाम रोशन करना था। इसीलिए साहित्य सृजन के क्रम को उन्होंने जारी रखा। वह पहले कानपुर फिर आगरा के एक महाविद्यालय में अंग्रेजी के प्रवक्ता नियुक्त हुए और बाद में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफेसर बने।
फिराक और हिन्दी के कवि हरिवंश राय बच्चन में एक समानता थी। दोनों इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के शिक्षक थे। श्री बच्चन यदि हिन्दी में लिखते थे तो फिराक साहब का शौक ऊर्दू लेखन था। अंग्रेजी भाषा के भरपूर ज्ञान, भारतीय संस्कृति और संस्कृत साहित्य की अच्छी समझ, गीता के दर्शन और उर्दू भाषा से लगाव ने फिराक को हिमालय बना दिया।
फिराक ने उर्दू गजल और शायरी को उस नाजुक वक्त में नयी जिन्दगी दी जब लग रहा था कि नारेबाजी और खोखली शायरी गजल की प्रासंगिकता को समाप्त कर देगी। लेकिन उन्होंने गजल में आम हिन्दुस्तानी का दर्द भर दिया। तभी वह कह सके-
“कहां का दर्द भरा था, तेरे फंसाने में
फिराक दौड गयी सह सी जमाने मे
शिव का विषपान सुना होगा मैं भी ऐ दोस्त
रात पी गया आंसू इस दौर में
जिन्दगी बसर की बीमार की रात हो गयी”
फिराक ने उर्दू साहित्य को उस जगह लाकर खड़ा कर दिया जो दुनिया की अन्य भाषाओं से काफी आगे नजर आता है। वह आवाज जिसमें एक जादू था खामोश हो गयी। लेकिन फिराक ने जिस आवाज को मर मर कर पाला था वह आज भी साहित्य की दुनिया में सुनायी दे रही है।
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