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कितना जरूरी है कानों का व्यायाम?
हम सभी जानते हैं कि तेज आवाज कानों को नुकसान पहुंचाती है। इससे कानों की सुनने की क्षमता पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। लेकिन सिर्फ तेज आवाज ही नहीं, अपर्याप्त या कम अवाज भी आपके कानों की सुनने की क्षमता पर विपरीत असर डालती है और उसे क्षति पहुंचाती है। इसका मतलब यह है कि जो लोग शोरगुल वाले शहरों में रहते हैं, उनकी सुनने की क्षमता ज्यादा बेहतर होती है।
जर्मनी के गिसेन विश्वविद्यालय में लगभग एक दशक तक 1000 लोगों की सुनने की क्षमता पर शोध किया गया। उम्मीद के अनुरूप ही इन शोधों में यह पाया गया कि जो लोग अपने कार्यस्थल पर बहुत ज्यादा आवाजों और शोरगुल के बीच रहते थे, जैसे कि निर्माण स्थलों पर काम करने वाले लोग, उनकी श्रवण शक्ति कमजोर थी। लेकिन इसके विपरीत जो लोग दूर-दराज के शांत इलाकों में रहते थे, उनकी श्रवण शक्ति भी कोई बहुत अच्छी नहीं थी।
जबकि जो लोग अपने काम की प्रवृत्ति की वजह से निरंतर आवाज और शोर-शराबे के बीच रहते हैं, जैसे कि वायुयान के पायलट या ऑर्केस्ट्रा के संगीतकार, उनकी सुनने की क्षमता अपेक्षाकृत बेहतर थी।
आग बुझाने वाले दल में काम करने वाले लोग, जो निरंतर तेज आवाजों के बीच रहते हैं, उनके कानों की सुनने की क्षमता आश्चर्यजनक रूप से बेहतर होती है।
श्रवण शक्ति पर किए गए इन शोधों से यह निष्कर्ष निकलता है कि आवाजों के साथ निरंतर संपर्क से कानों को उनकी आदत पड़ जाती है। वास्तव में तेज आवाज ही कानों और सुनने की क्षमता को क्षति पहुंचाती है।
इस शोध से यह निष्कर्ष निकलता है कि एशिया के पुराने शांत गांव, जहां आमतौर पर बहुत शांति होती है और कभी किन्हीं खास अवसरों पर ही शोर-शराबा या आतिशबाजी वगैरह होती है, वहां के लोगों की सुनने की क्षमता सबसे कमजोर होती है।
(साभार: रीडर्स डाइजेस्ट, सर्वाधिकार सुरक्षित।)
कितना जरूरी है कानों का व्यायाम?
हम सभी जानते हैं कि तेज आवाज कानों को नुकसान पहुंचाती है। इससे कानों की सुनने की क्षमता पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। लेकिन सिर्फ तेज आवाज ही नहीं, अपर्याप्त या कम अवाज भी आपके कानों की सुनने की क्षमता पर विपरीत असर डालती है और उसे क्षति पहुंचाती है। इसका मतलब यह है कि जो लोग शोरगुल वाले शहरों में रहते हैं, उनकी सुनने की क्षमता ज्यादा बेहतर होती है।
जर्मनी के गिसेन विश्वविद्यालय में लगभग एक दशक तक 1000 लोगों की सुनने की क्षमता पर शोध किया गया। उम्मीद के अनुरूप ही इन शोधों में यह पाया गया कि जो लोग अपने कार्यस्थल पर बहुत ज्यादा आवाजों और शोरगुल के बीच रहते थे, जैसे कि निर्माण स्थलों पर काम करने वाले लोग, उनकी श्रवण शक्ति कमजोर थी। लेकिन इसके विपरीत जो लोग दूर-दराज के शांत इलाकों में रहते थे, उनकी श्रवण शक्ति भी कोई बहुत अच्छी नहीं थी।
जबकि जो लोग अपने काम की प्रवृत्ति की वजह से निरंतर आवाज और शोर-शराबे के बीच रहते हैं, जैसे कि वायुयान के पायलट या ऑर्केस्ट्रा के संगीतकार, उनकी सुनने की क्षमता अपेक्षाकृत बेहतर थी।
आग बुझाने वाले दल में काम करने वाले लोग, जो निरंतर तेज आवाजों के बीच रहते हैं, उनके कानों की सुनने की क्षमता आश्चर्यजनक रूप से बेहतर होती है।
श्रवण शक्ति पर किए गए इन शोधों से यह निष्कर्ष निकलता है कि आवाजों के साथ निरंतर संपर्क से कानों को उनकी आदत पड़ जाती है। वास्तव में तेज आवाज ही कानों और सुनने की क्षमता को क्षति पहुंचाती है।
इस शोध से यह निष्कर्ष निकलता है कि एशिया के पुराने शांत गांव, जहां आमतौर पर बहुत शांति होती है और कभी किन्हीं खास अवसरों पर ही शोर-शराबा या आतिशबाजी वगैरह होती है, वहां के लोगों की सुनने की क्षमता सबसे कमजोर होती है।
(साभार: रीडर्स डाइजेस्ट, सर्वाधिकार सुरक्षित।)
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