19 जून 2013

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संभल जा अभी वक़्त है संभलने का...
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जांनिसार अख्तर


ज़माना आज नहीं डगमगा के चलने का
संभल भ़ी जा कि अभी वक़्त है संभलने का

ये ठीक है कि सितारों पे घूम आये हम
मगर किसे है सलीक़ा ज़मीं पे चलने का

फिरै हैं रातों को आवारा हम, तो देखा है
गली-गली में समां चांद के निकलने का

हमें तो इतना पता है कि जब तलक हम हैं
रिवाज-ए-चाक गिरेबां नहीं बदलने का

(साभारः तनहा सफ़र की रात, डायमंड प्रकाशन, सर्वाधिकार सुरक्षित।)

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पाठकों की राय

19 जून 2013

Mar 07, 2011

“रिवाज-ए-चाक गिरेबां नहीं बदलने का” मतलब है कि हम जैसे हैं वैसे ही रहेंगे हम नहीं बदलेंगे

editor mumbai

Mar 03, 2011

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