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तेनाली राम के बारे में
(1520 ई. में दक्षिण भारत के विजयनगर राज्य में राजा कृष्णदेव राय हुआ करते थे। तेनाली राम उनके दरबार में अपने हास-परिहास से लोगों का मनोरंजन किया करते थे। उनकी खासियत थी कि गम्भीर से गम्भीर विषय को भी वह हंसते-हंसते हल कर देते थे।
उनका जन्म गुंटूर जिले के गलीपाडु नामक कस्बे में हुआ था। तेनाली राम के पिता बचपन में ही गुजर गए थे। बचपन में उनका नाम ‘राम लिंग’ था, चूंकि उनकी परवरिश अपने ननिहाल ‘तेनाली’ में हुई थी, इसलिए बाद में लोग उन्हें तेनाली राम के नाम से पुकारने लगे।
विजयनगर के राजा के पास नौकरी पाने के लिए उन्हें बहुत संघर्ष करना पड़ा। कई बार उन्हें और उनके परिवार को भूखा भी रहना पड़ा, पर उन्होंने हार नहीं मानी और कृष्णदेव राय के पास नौकरी पा ही ली। तेनाली राम की गिनती राजा कृष्णदेव राय के आठ दिग्गजों में होती है।)
सबसे बड़ा बच्चा
दीवाली निकट आ रही थी। राजा कृष्णदेव राय ने राज दरबार में कहा-“क्यों न इस बार दीवाली कुछ अलग ढंग से मनाई जाए? ऐसा आयोजन किया जाए कि उसमें बच्चे-बड़े सभी मिलकर भाग लें।” “विचार तो बहुत उत्तम है महाराज।” मंत्री ने प्रसन्न होकर कहा। सबने अपने-अपने सुझाव दिए।
पुरोहित जी ने एक विशाल यज्ञ के आयोजन का सुझाव दिया तो मंत्री जी ने दूर देश से जादूगरों को बुलाने की बात कही। और भी दरबारियों ने अपने सुझाव दिए। लेकिन कृष्णदेव राय को किसी का सुझाव नहीं जंचा, उन्होंने सुझाव हेतु तेनालीराम की ओर देखा। तेनाली राम मुस्कराया। फिर बोला-“क्षमा करें महाराज, दीपावली तो दीपों का पर्व है। यदि अलग ढंग का ही आयोजन चाहते हैं तो ऐसा करें-रात में तो हर वर्ष दीये जलाए ही जाते हैं। इस बार दिन में भी जलाएं।”
यह सुनकर सारे दरबारी ठठाकर हंस पड़े। मंत्री फब्ती कसते हुए बोला-“शायद बुढ़ापे की वजह से तेनाली राम को कम दिखाई देने लगा है, इसलिए इन्हें दिन में भी दीये चाहिए।” राजा कृष्णदेव राय भी तेनाली राम के इस सुझाव पर खीझे हुए थे, बोले-“तेनाली राम, हमारी समझ में तुम्हारी बात नहीं आई।” “महाराज मैं मिट्टी के दीये नहीं जीते-जागते दीपों की बात कर रहा हूं। और वे हैं हमारे नन्हें-मुन्ने बच्चे! जिनकी हंसी दीपों की लौ से भी ज्यादा उज्जवल है।” तेनाली राम ने कहा।
“तुम्हारी बात तो बहुत अच्छी है! लेकिन कार्यक्रम क्या हो?” राजा ने पूछा। “महाराज, इस बार दीवाली पर बच्चों के लिए एक मेले का आयोजन हो। बच्चे दिन भर उछलें-कूदें, हंसें-खिलखिलाएं, प्रतियोगिताओं में भाग लें। इस मेले का इंतजाम करने वाली भी बच्चे ही हों। बड़े भी उस मेले में जाएं लेकिन बच्चों के रूप में। वे कहीं भी किसी भी बात में दखल न दें। जो बच्चा सर्वप्रथम आएगा, उसे राज्य का सबसे बड़ा बच्चा पुरस्कार दें...!”
तेनाली राम ने अपनी बात पूरी की। “लेकिन राज्य का सबसे बड़ा बच्चा कौन है?” राजा ने पूछा। “वह तो आप ही हैं महाराज। आपसे बढ़कर बच्चों जैसा, निर्मल स्वभाव और किसा होगा?” तेनाली राम मुस्कराया।
यह सुनकर राजा कृष्णदेव राय की हंसी छूट गई। दरबारी भी मंद-मंद मुस्कराने लगे। दीवाली का दिन आया। बच्चों के मेले की बड़ी धूम रही।
राजा कृष्णदेव राय बहुत खुश थे, बोले-“कमाल कर दिया बच्चों ने। सचमुच, इन नन्हें-मुन्ने दीपों का प्रकाश तो अदभुत है, अनोखा है, सबसे प्यारा है।”
(साभारः तेनालीराम की सूझबूझ, डायमंड प्रकाशन, सर्वाधिकार सुरक्षित।)
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