निमिष कुमार,
संपादक,
हिन्दी इन डॉट कॉम
देश की संसद के लोकसभा में बुधवार को विपक्ष का मल्टी-ब्रांड रीटेल में एफडीआई में संशोधन का प्रस्ताव गिर गया। दो दिन की लंबी बहस में 18 राजनैतिक दलों ने हिस्सा लिया और अपने मत रखे। बुधवार शाम जब वोटिंग हुई तो सरकार को सदन में मौजूद 471 सांसदों में से 253 सांसदों के मत मिले, वहीं विपक्ष को सिर्फ 218 सांसदों के मत से संतोष करना पड़ा। नंबरों के इस गेम से परे, राजनैतिक दांव-पेंच में सरकार भी जीती और विपक्ष भी जीता। तो कहीं सरकार हारी तो विपक्ष भी हारा। अब इस प्रस्ताव को राज्यसभा में पेश किया जाएगा, जहां इस पर बहस और मतदान होगा। यदि मल्टी-ब्रांड रिटेल में एफडीआई का प्रस्ताव राज्यसभा में भी पास हो जाता है तो वॉलमार्ट, टेस्को, क्योफोर जैसे कई अंर्तराष्ट्रीय रिटेल कंपनियां भारत में बिजनेस कर सकेगी। सरकार के संसद में दिए बयानों की मानें तो देश के 53 शहर ऐसे है जहां की जनसंख्या 10 लाख से ज्यादा है और ऐसे शहरों में इन रिटेल कंपनियों को अपने ऑउटलेट खोलने की इजाजत होगी। सरकार की मानें तो भारत में बिजनेस शुरु करने से पहले इन रिटेल कंपनियों को 100 मिलियन डॉलर का निवेश करना होगा। इतना ही नहीं इन अंर्तराष्ट्रीय रिटेल कंपनियों को 30 फीसदी सामान स्थानीय लघु औद्योगिक इकाईयों से लेना पड़ेगा। 40 लाख रोजगार के अवसर पैदा होंगे। हमारे किसानों को बिचौलियों के आगे हाथ नहीं पसारना पड़ेगा। मतलब मल्टी-ब्रांड रिटेल में एफडीआई के आने से चांदी ही चांदी हो जाएगी। तो सरकार, फिर आजादी के बाद से अब तक 65 साल क्यों लगा दिए? देश आजाद हुआ 15 अगस्त, 1947 को और उसी दिन देश में मल्टी-ब्रांड रिटेल में एफडीआई ले आते।
कपिल सिब्बल ने संसद में मजाकिया लहजे में कहा कि होम फर्निशिंग के बाजार का लीडर ‘आइक्या’ भारत में आया तो वो क्या अपने फर्नीचर के लिए लकड़ी चीन या मलेशिया से लाएगा? सिब्बलजी इस पर हंसे और विपक्ष पर व्यंग्य किया। लेकिन आइक्या तो छोड़िए, भारत के फर्नीचर बाजार के बड़े नाम मलेशिया से अपना फर्नीचर मंगाते हैं, फिर उसे आपके आर्डर पर आपके घर लाकर जोड़ा जाता है। ये तथ्य तब मालूम चला जब घर पर लाइब्रेरी के लिए एक वुडन रैक खरीदने की जरुरत पड़ी। भारतीय फर्नीचर के दुकानदारों के पास ना तो वैसे रैक थे ना ही उनकी कीमत ऐसी थी कि आपके बजट में समा जाए। जब एक नामी होम फर्निशिंग चेन के आउटलेट पर ऑर्डर दिया तो दो दिनों बाद एक बक्से में आए सामान के ऊपर मलेशिया की कंपनी का नाम और सील लगी हुई थी। साथ आए टेक्नीशियन ने बताया कि कंपनी सारा माल मलेशिया से मंगाती है और हम लोग यहां जोड़ते बस हैं।
हाल ही दीपावली के दौरान जब खबरें बनाई तो चीनी सामान के भारतीय बाजार में घुसपैठ सामने आई। अब तो चीनी पटाखें, चीनी लाइटें ही नहीं चीनी गणेशजी, चीनी लक्ष्मीजी भी भारतीय बाजार में मिल रहे थे। सीधी सी बात है-धंधा कभी घाटे में नहीं किया जाता। ऐसे में यदि भारतीय लघु उद्योग इन बड़े रिटेलरों की मांग के मुताबिक इंटरनेशनल क्वालिटी का माल उनकी कीमत पर नहीं बना पाए तो क्या होगा? इतना आसान नहीं होगा एक बार भारतीय बाजार में पैर जमाने के बाद इन अंर्तराष्ट्रीय रिटेलरों के खिलाफ कार्रवाई करना। क्योंकि तब इन्हें भारतीय सिस्टम की अच्छी जानकारी हो जाएगी और ये जान जाएंगे कि हमारे देश के सिस्टम में बचा कैसे जाता है।
दिल्ली के मयूर विहार इलाके का वाकया है। बात यही कोई 2005-06 की है। उस इलाके में एक भारतीय रिटेल कंपनी ने अपना ऑउटलेट खोला। ओपनिंग के साथ ढेरों नई योजनाएं लाया, जिसमें एक खूब चली, वो थी एक निश्चित रकम का सामान खरीदों और इतनी शक्कर मुफ्त ले जाओं। मैंने कई बार शाम के वक्त उस ऑउटलेट का मुआयना किया और हर बार कई परिवारों को खासकर गृहणियों को जानबूझ कर 100-200 रुपये का सामान खरीदते देखा सिर्फ इसीलिए कि उनका बिल योजना की रकम को पार कर जाए और वो मुफ्त शक्कर की उम्मीदवार हो जाए। इस घटनाक्रम का एक दूसरा पहलू भी है। जब वो ऑउटलेट खुला तो मैनें पड़ोस के परचूनिए को एक दिन समझाया। बताया कि ग्राहक अब देवता होते जा रहा है इसीलिए जो ग्राहक चाहे वो सामान रखने की कोशिश करों, अपनी सेवा सुधारों, देखों पास में रिटेल ऑउटलेट आ गया है। वो नहीं माना, और उसका दुकानदारी का तरीका वही रहा जो इतने सालों से चला आ रहा था। कुछ महीनों बाद पता चला कि उसने आर्थिक तंगी से आजिज आकर खुदकुशी करने की कोशिश की। जब उससे मिला, तो उसका जवाब था- साबजी, चार अंडे और ब्रेड बेचकर मैने अपने परिवार को नहीं पाल सकता’। उसका कहना सही था। अब कॉलोनी के लोग उसकी दुकान पर वहीं सामान खरीदने आते जिसकी तुरंत जरुरत होती, जैसे सुबह नाश्ते के वक्त ब्रेड या अंडे। बाकी सामान लोग थोक में रिटेल ऑउटलेट से खरीदते।
कई बार किसानों से पूछा कि वो आखिरकार फाइव स्टार होटलों या उस तरह के ग्राहकों के लिए खास फल, सब्जियां क्यों नहीं उगाते? किसानों का जवाब बहुत सीधा था – साहब, उनके इतने नखरे होते है जितने तो नई दुल्हन नहीं करती। यही बात संसद में भी मंगलवार और बुधवार को बार-बार उठी। संसद में बताया गया कि एक बहुराष्ट्रीय कंपनी ने पहले तो पंजाब के किसानों से पॉटेटो चिप्स के लिए आलू और टमेटो सॉस के लिए टमाटर खरीदने का वादा किया, लेकिन बाद में ये कहते हुए कि आपके आलू मीठे है और टमाटर खट्टे, अपने वादे से मुकर गए। सही भी है जिस पूरी दुनिया में कहीं से भी सामान खरीदने की छूट होगी वो भला क्यों आपके यहां से महंगा खरीदेगा। जिस दाम पर चीनी ब्राजील में सोयाबीन उगा रहे हैं, या डेनमार्क जैसे देशों में चीज़ बन रहा है, क्या हम उस दाम पर सामान बना पाएंगे? क्या हमारी सरकारें इन विदेशी रिटेल कंपनियों को ऊंचे दामों पर हमारे उत्पादकों से सामान खरीदने को मजबूर कर सकेगी? आसान नहीं है इन अंर्तराष्ट्रीय रिटेल कंपनियों पर नकेल कसना यदि एक बार ये भारतीय बाजार में आ गए।
अब मुद्दे की बात। हमारे पड़ोस का परचूनिया वो होता है जो अपनी जिंदगी में पढा़ई की दौड़ में बुरी तरह हारा। क्योंकि यदि किसी परचूनिए का बेटा आईआईटी, आईआईएम से पढ़ेगा तो वो अपने बेटे को परचून की दुकान पर नहीं बैठाएगा। यदि किसी के पास अच्छी सरकारी या कॉर्पोरेट नौकरी होगी तो वो सब छोड़ कर गली में परचून की दुकान नहीं खोलेगा। दरअसल हमारा किरानेवाला एचआरडी की भाषा में सबसे पीछे रह गया इंसान है, जो कुछ नहीं तो आखिरकार दुकान ही सही की तर्ज पर अपनी जिंदगी बिता रहा है। ऐसे में ये सोचना कि वो किरानेवाला अरबों-खरबों का दुनियाभर में बिजनेस करने वाली इन रिटेल कंपनियों के रहते भी पहले की तरह मुनाफा कमा लेगा, शायद सही नहीं होगा। क्योंकि यदि वो साल-दर-साल मुनाफा कमाते रहेगा तो ये अंर्तराष्ट्रीय रिटेल कंपनियां अपनी बैलेंस शीट्स में साल-दर-साल मुनाफा कैसे बताएंगी? सरकार, वॉलमार्ट जैसी कंपनियां यहां बिजनेस करने आ रही हैं, धरमशाला खोलने नहीं।
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22 मई 2013
Dec 06, 2012
रेशियो उल्टा होना चाहिए 70% देसी और 30% इंपोर्टेड
Raj Kumar Chennai
Dec 06, 2012
Good mr. Editor, this the ground zero truth..Good one for read..
srinivas reddy hyderabad
Dec 06, 2012
5 मिनिट देश के नामअफ डी आई पर जबरदस्त घमासान हमारे देश मे चल रहा ह पार्लियामेंट मे सबने अपने विचार रखे. एक बात म भी कहना चाहता हू की क्या अफ डी आई सिर्फ़ विदेशी कंपनी ही कर सकती है ??अगर हमारी सरकार देश की प्रगति को बढ़ाना चाहती ह तो क्या ज़रूरी ह की विदेशी कंपनी ही एसा काम करे?? ओर विदेशी कंपनी 70% वीदेसो से समान ख़रीदेगी ओर 30% इंडिया से. एसका साफ सा मतलब ह की हमारे खरीदने का 70% समान वेदेश्ो से आएगा .मतलब 70% समान हमारी ज़रूरत का ,आयात होगा .तो जाहिर ह की रुपया कमजोर होगा .ओर सरकार के पास महगाई का रोना रोने का एक बहाना भी होगा . देश की अर्थव्यवस्था को सही करने के लिए जहा हमे निर्यात करने की सख़्त ज़रूरत ह .वाहा सरकार आयात को बढ़ावा दे रही ह. क्या हमारे देश मे असे उद्योगपति नही ह जो एस तरह की कंपनी को इंडिया मे खोल सके ?? क्या हमारे देश का मानेगएमेंट कॉलेज इतने खराब ह की वो असे स्टूडेंट नही बनती जो असे कंपनी को चला सके. क्या इंजिनियर की कमी ह,या मेहनती नोजवानो की जो किसी भी काम को करने मे गुरेज नही समझते/ शायद सरकार को हिन्दुस्तानियो पर भरोसा नही रहा .एसलिए वो विदेशियों को हीदुस्तान मे कंपनी चलाने की ज़िमेदारी सोपना चाहती ह / विदेशी कोम्पनियो को देश मे पनाह देने के नाम पर काफ़ी पैसा भी लिया जाएगा .जैसे टेलिकॉम मे हुआ था. ओर . वो लोग वो सब पैसा हमारी जेब से निकलेंगे ./ ओर दिग्गज लोगो के लिए ब्लॅक मनी को विदेशो मे भेजने का भी अक्चा तरीका होगा. म सिर्फ़ ये कहना चाहता हूँ की हम हिन्दुस्तानी भी सब कुछ कर सकते ह /हमे ओर ईस्ट इंडिया कंपनी की ज़रूरत नही ह/ जो काम अफ डी आई करेगी उसे करने को देश के लोगो को प्ररित करो ताकि डेस्क का पैसा देश मे रहे ओर 100 % समान हमे हमारे देश से ही मईळे.ओऱ उत्पादन सीमा बड़ी तो हम निर्यात भी कर सके.
mani singh delhi
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