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(भारतीय साहित्य की नीति कथाओं का विश्व में महत्वपूर्ण स्थान है। पंचतंत्र उनमें प्रमुख है। पंचतंत्र की रचना विष्णु शर्मा नामक व्यक्ति ने की थी। उन्होंने एक राजा के मूर्ख बेटों को शिक्षित करने के लिए इस पुस्तक की रचना की थी। पांच अध्याय में लिखे जाने के कारण इस पुस्तक का नाम पंचतंत्र रखा गया। इस किताब में जानवरों को पात्र बना कर शिक्षाप्रद बातें लिखी गई हैं। इसमें मुख्यत: पिंगलक नामक सिंह के सियार मंत्री के दो बेटों दमनक और करटक के बीच के संवादों और कथाओं के जरिए व्यावहारिक ज्ञान की शिक्षा दी गई है। सभी कहानियां प्राय: करटक और दमनक के मुंह से सुनाई गई हैं।)
सांझ हो गई थी पंछी अपने घौंसले से घर लौट रहे थे। लेकिन एक पेड़ के नीचे खड़ी हिरनी की उदासी गहरी होती जा रही थी। वह गुमसुम सी डूबते सूरज को देख रही थी।
हिरनी को उदास देख हिरण उसके पास आया और बोला- मैं बहुत देर से देख रहा हूं आज तुम बहुत उदास हो। मुझे अपनी चिंता का कारण बताओ। हिरन की आवाज सुनते ही हिरनी की आंखे छलछला गईं। वह साहस बटोर कर बोली- सुना है, कल राजा के यहां राजकुमार का जन्मदिन मनाया जाने वाला है। कल बड़ा भारी उत्सव होगा। और इस अवसर पर तरह-तरह के पकवान बनेंगे। यह कहकर हिरनी जोर-जोर से रोने लगी।
एक क्षण तक हिरण मौन रहा। फिर धीरज के साथ उसने कहा- इतनी छोटी सी बात के लिए तू दुःखी हो रही है।हम सब राजा के जंगल में रहते हैं। इसलिए हम उनके सेवक हैं। उनकी खुशी के लिए अगर मुझे बलिदान भी देना पड़े तो ये मेरा सौभाग्य होगा। इसी बहाने में उनके ऋण से मुक्त हो जाऊंगा। वैसे भी एक दिन मरना ही है।
किसी का शिकार बनने से तो अच्छा ही है कि राजकुमार के जन्मदिन पर मरूं। हिरणी बोली आपके जाने से मेरी दुनिया सूनी हो जाएगी। मैं कैसे जीऊंगी?
हम आज रात ही ये राज्य छोड़ देते हैं और ऐसी जगह चलते हैं जहां दूर-दूर तक कोए न हो। लेकिन हिरण पर उसकी बात का कोई असर नहीं हुई।
दूसरे दिन जैसे ही सूरज निकला हिरणी का दिल भारी होने लगा। थोड़ी ही देर में दो सैनिक तलवारें लिए उसके सामने खड़े थे। उन्हें देखकर हिरनी ने आंखे बंदकर लीं। जब उसने आंखे खोली तो वहां सैनिक थे और न ही हिरण। वह बेसुध हो गई। उस दिन उसने कुछ नहीं खाया-पिया। बस, हिरण की याद में रोती रही।
शाम को साहस करके हिरनी महम लें पहुंची। वहां जन्मोत्सव खत्म हो चुका था। वह महारानी के पास गई और उससे कहा- मैं आपके राज्य की हिरनी हूं। आज के महोत्सव में मेरे पति ने अपने प्राण त्याग कर आपकी रसोई की शोभा बढ़ाई है। उसके सिवा मेरा कोई नहीं था। मेरी आपसे विनती है कि आप मुझे हिरन की खाल दे दें। मैं उसे देखकर ही जी लूंगी।
लेकिन निर्दयी रानी ने हिरनी की प्रार्थना स्वीकार नहीं की। रानी ने कहा- उस खाल की तो मैं खंजड़ी बनवाऊंगी। जिसे बजा-बजा कर मेरा बेटा खेलेगा।
हिरनी दुःखी होती हुई वहां से चली गई। उसके बाद जब भी महल से खंजड़ी बजने की आवाज आती हिरनी उसे सुनकर घंटों आंसू बहाती।
(साभारः पंचतंत्र की मनोरंजक कहानियाँ, डायमंड प्रकाशन, सर्वाधिकार सुरक्षित।)
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