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(हमारी लोककथाएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से चली आ रही हैं। इनमें भारत की सांस्कृतिक एकता और धार्मिक मान्यताओं की सुंदर झलक देखने को मिलती है। दरअसल, कथाएँ बच्चों की सूझ-बूझ विकसित करने और उनकी मानसिक क्षुधा शांत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। बालपन का कल्पना संसार विस्तृत होता चला जाता है। साथ ही सामाजिक मूल्य और भारतीय संस्कारों के प्रति चेतना भी जाग्रत होती है।)
क्या बोले ये पंछी
एक राजा था उसके महल के आंगन में एक नीम का पेड़ था। रोज एक पंछी उस पेड़ पर आकर बैठता और चारों पहर अलग-अलग बातें कहता। पहले पहर में, ‘किस मुंख दूध पिलाऊं’ दूसरे पहर में ‘ऐसा कहूं न दीख’ तीसरे पहर में ‘अब हम करबूं का’ और चौथे पहर में ‘सब विदवान मर जाएं’।
रोज उसकी बातें सुनकर राजा सोच में पड़ जाता लेकिन राजा को इन बातों को अर्थ समझ में नहीं आता। एक दिन उसने राजपुरोहित को बुलाया और पक्षी द्वारा कही गई सारे बातें बताकर उनका अर्थ पूछा। लेकिन पुरोहित ने थोड़ा समय मांगा और अपने घर लौट गया।
जब वह घर पहुंचा तो बहुत परेशान था। उसे देखकर पुरोहित की पत्नी ने परेशानी का कारण पूछा। तब पुरोहित ने पक्षी के प्रश्न कह सुनाए। प्रश्न सुनकर वह बोली- सब, इतनी सी बात। मैं राजा को सभे प्रश्नों के जवाब दे सकती हूं। कल मैं आपके साथ राजदरबार चलूंगी।
दूसरे दिन पुरोहित के साथ उसकी पत्नी भी राजदरबार में पहुंची। राजा ने पहले प्रश्न ‘किस मुख्ज दूध पिलाऊं’ का अर्थ पूछा। पुरोहित की पत्नी ने कहा ‘महाराज ये पक्षी आधी बात बोलता है, पूरी बात इस प्रकार है- लंका में रावण भयो, बीस भुजा दस शीश, माता ओ कि जा कहे, किस मुंख दूध पिलाऊं? यानी लंक अमें रावण ने जन्म लिया, उसकी बीस भुजाएं और दस सिर हैं। यह देखकर माता कहती है कि मिअं उसे कौन-कौन से मुख से दूध पिलाऊं?
राजा ने दूसरा प्रश्न पूछा ‘ऐसो कहूं न दीख?’ पूरोहित की पत्नी ने बताया ‘घर जम्ब नव दीप, बिना चिंता को ऐसो आदमी कहूं न दीख। यानी चारों दिशाओं, पृथ्वी, नवखंड सभी छान मारों पर बिना चिंता का आदमी कहीं नहीं मिलेगा।
राजा ने तीसरा प्रश्न पूछा- ‘अब हम करबूं का’? पुरोहित की पत्नी बोली ‘पांच वर्ष की कन्या साठे दई ब्याहे, बैठी करम बिसरूती, अब हम करबूं का? यानी पांच वर्ष की कन्या का विवाह एक बूढ़े से करवा दें तो वह अपनी किस्मत को कोसती हुई ये कहेगी ‘अब मैं क्या करूं’।
चौथा प्रश्न था ‘सब विदवान मर जाएं’। पुरोहित की पत्नी ने कहा कि ‘विश्व सगंत जो करें, सुरा मांस जो खाएं, बिना सपरे भोजन करें, वे सब विदवान मर जाएं’। यानी जो विद्वान परस्त्री की सगंति करें, सुरा और मांस का सेवन करें और बिना स्नान के भोजन करें ऐसे विद्वान का मर जाना ही उचित है।
राजा इन सभी प्रश्नों के उत्तर जानकर बहुत खुश हुआ। उसने पुरोहित की पत्नी की बुद्धि को सराहा और खूब सारा धन देकर उसे विदा किया।
(साभारः भारत की लोक कथाएं, डायमंड प्रकाशन, सर्वाधिकार सुरक्षित।)
(हमारी लोककथाएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से चली आ रही हैं। इनमें भारत की सांस्कृतिक एकता और धार्मिक मान्यताओं की सुंदर झलक देखने को मिलती है। दरअसल, कथाएँ बच्चों की सूझ-बूझ विकसित करने और उनकी मानसिक क्षुधा शांत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। बालपन का कल्पना संसार विस्तृत होता चला जाता है। साथ ही सामाजिक मूल्य और भारतीय संस्कारों के प्रति चेतना भी जाग्रत होती है।)
क्या बोले ये पंछी
एक राजा था उसके महल के आंगन में एक नीम का पेड़ था। रोज एक पंछी उस पेड़ पर आकर बैठता और चारों पहर अलग-अलग बातें कहता। पहले पहर में, ‘किस मुंख दूध पिलाऊं’ दूसरे पहर में ‘ऐसा कहूं न दीख’ तीसरे पहर में ‘अब हम करबूं का’ और चौथे पहर में ‘सब विदवान मर जाएं’।
रोज उसकी बातें सुनकर राजा सोच में पड़ जाता लेकिन राजा को इन बातों को अर्थ समझ में नहीं आता। एक दिन उसने राजपुरोहित को बुलाया और पक्षी द्वारा कही गई सारे बातें बताकर उनका अर्थ पूछा। लेकिन पुरोहित ने थोड़ा समय मांगा और अपने घर लौट गया।
जब वह घर पहुंचा तो बहुत परेशान था। उसे देखकर पुरोहित की पत्नी ने परेशानी का कारण पूछा। तब पुरोहित ने पक्षी के प्रश्न कह सुनाए। प्रश्न सुनकर वह बोली- सब, इतनी सी बात। मैं राजा को सभे प्रश्नों के जवाब दे सकती हूं। कल मैं आपके साथ राजदरबार चलूंगी।
दूसरे दिन पुरोहित के साथ उसकी पत्नी भी राजदरबार में पहुंची। राजा ने पहले प्रश्न ‘किस मुख्ज दूध पिलाऊं’ का अर्थ पूछा। पुरोहित की पत्नी ने कहा ‘महाराज ये पक्षी आधी बात बोलता है, पूरी बात इस प्रकार है- लंका में रावण भयो, बीस भुजा दस शीश, माता ओ कि जा कहे, किस मुंख दूध पिलाऊं? यानी लंक अमें रावण ने जन्म लिया, उसकी बीस भुजाएं और दस सिर हैं। यह देखकर माता कहती है कि मिअं उसे कौन-कौन से मुख से दूध पिलाऊं?
राजा ने दूसरा प्रश्न पूछा ‘ऐसो कहूं न दीख?’ पूरोहित की पत्नी ने बताया ‘घर जम्ब नव दीप, बिना चिंता को ऐसो आदमी कहूं न दीख। यानी चारों दिशाओं, पृथ्वी, नवखंड सभी छान मारों पर बिना चिंता का आदमी कहीं नहीं मिलेगा।
राजा ने तीसरा प्रश्न पूछा- ‘अब हम करबूं का’? पुरोहित की पत्नी बोली ‘पांच वर्ष की कन्या साठे दई ब्याहे, बैठी करम बिसरूती, अब हम करबूं का? यानी पांच वर्ष की कन्या का विवाह एक बूढ़े से करवा दें तो वह अपनी किस्मत को कोसती हुई ये कहेगी ‘अब मैं क्या करूं’।
चौथा प्रश्न था ‘सब विदवान मर जाएं’। पुरोहित की पत्नी ने कहा कि ‘विश्व सगंत जो करें, सुरा मांस जो खाएं, बिना सपरे भोजन करें, वे सब विदवान मर जाएं’। यानी जो विद्वान परस्त्री की सगंति करें, सुरा और मांस का सेवन करें और बिना स्नान के भोजन करें ऐसे विद्वान का मर जाना ही उचित है।
राजा इन सभी प्रश्नों के उत्तर जानकर बहुत खुश हुआ। उसने पुरोहित की पत्नी की बुद्धि को सराहा और खूब सारा धन देकर उसे विदा किया।
(साभारः भारत की लोक कथाएं, डायमंड प्रकाशन, सर्वाधिकार सुरक्षित।)
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