03 जुलाई 2009
वार्ता
नई दिल्ली। दिल्ली उच्च न्यायालय के गुरुवार को समलैंगिकता को वैध करार देने के बावजूद भारतीय दंड विधान (भादवि) की धारा-377 पूरी तरह से समाप्त नहीं होगी।
न्यायालय के इस फैसले के बावजूद समलैंगिक संबंधों के लिए “दो वयस्कों के बीच परस्पर सहमति” आवश्यक होगी। यदि ऐसा साबित होता है कि किसी एक पक्ष ने इसके लिए बल प्रयोग किया है या यदि शिकायतकर्ता नाबालिग है, तो सहमति भी प्रासंगिक नहीं होगी। ऐसे मामले में आरोपियों पर अप्राकृतिक यौनाचार के जुर्म में आपराधिक मामला चलाया जा सकता है।
मर्जी से समलैंगिक संबंध जायज: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली उच्च न्यायालय का फैसला भी पूरे देश में लागू नहीं होगा। इस मसले पर अंतिम फैसला सर्वोच्च न्यायालय द्वारा लिया जाएगा।
अगर वह दिल्ली उच्च न्यायालय का फैसला बरकरार रखता है, तो फिर पूरे देश में समलैंगिकता को वैध माना जाएगा।
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