14 जुलाई 2009
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस
वॉशिंगटन। हम और आप अक्सर इंसानी चेहरे को देखकर ही उसके हावभाव का अंदाजा लगा लेते हैं। परंतु सभी के लिए यह बात थोड़ी चौंकाने वाली है कि रेसस बंदर भी हमारी तरह चेहरे को पढ़ लेते हैं।
हाल ही में हुए एक शोध में इंसानों और बंदरों में समानता की यह बात सामने आई है। शोध के मुताबिक चेहरे को देखकर धारणा बनाने के मामले में दोनों एक जैसे हैं।
बंदरों ने कतार में बैठकर भोजन खाया
इस शोध को अंजाम देने वाली टीम का नेतृत्व इमोरी विश्वविद्यालय के रॉबर्ट आर.हैप्मटन ने किया। हैम्पटन ने कहा, “इंसानों और अन्य सामाजिक प्राणियों को अन्य लोगों को पहचानने की जरूरत पड़ती है। वे इसके जरिए ही अपना-पराया, दोस्त-दुश्मन और अन्य संबंधों को समझते हैं।”
उन्होंने बताया, “हमारे शोध से संकेत मिलता है पहचानने की क्षमता मनुष्य में तीन करोड़ वर्ष या इससे भी अधिक पहले विकसित हुई थी। उस समय के प्राचीन मानव बंदरों की तरह थे।”
वाराणसी में मिली दुर्लभ “शर्मीली बिल्ली”
शोध के दौरान चार वर्ष के रेसस बंदरों को छह विभिन्न बंदरों की तस्वीर दिखाई गई। यह रेसस बंदर दो से तीन वर्ष तक सामाजिक समूह में पले-बढ़े थे। शोध के बाद शोधकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि यह बंदर चेहरों को पढ़ने में सक्षम हैं।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस
वॉशिंगटन। हम और आप अक्सर इंसानी चेहरे को देखकर ही उसके हावभाव का अंदाजा लगा लेते हैं। परंतु सभी के लिए यह बात थोड़ी चौंकाने वाली है कि रेसस बंदर भी हमारी तरह चेहरे को पढ़ लेते हैं।
हाल ही में हुए एक शोध में इंसानों और बंदरों में समानता की यह बात सामने आई है। शोध के मुताबिक चेहरे को देखकर धारणा बनाने के मामले में दोनों एक जैसे हैं।
बंदरों ने कतार में बैठकर भोजन खाया
इस शोध को अंजाम देने वाली टीम का नेतृत्व इमोरी विश्वविद्यालय के रॉबर्ट आर.हैप्मटन ने किया। हैम्पटन ने कहा, “इंसानों और अन्य सामाजिक प्राणियों को अन्य लोगों को पहचानने की जरूरत पड़ती है। वे इसके जरिए ही अपना-पराया, दोस्त-दुश्मन और अन्य संबंधों को समझते हैं।”
उन्होंने बताया, “हमारे शोध से संकेत मिलता है पहचानने की क्षमता मनुष्य में तीन करोड़ वर्ष या इससे भी अधिक पहले विकसित हुई थी। उस समय के प्राचीन मानव बंदरों की तरह थे।”
वाराणसी में मिली दुर्लभ “शर्मीली बिल्ली”
शोध के दौरान चार वर्ष के रेसस बंदरों को छह विभिन्न बंदरों की तस्वीर दिखाई गई। यह रेसस बंदर दो से तीन वर्ष तक सामाजिक समूह में पले-बढ़े थे। शोध के बाद शोधकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि यह बंदर चेहरों को पढ़ने में सक्षम हैं।
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