पिछली बार आपने पढ़ा:
अमीर के ऐलान के बाद सभी जासूस मुल्ला की तलाश में वेश बदलकर सभी दिशाओं में फैल जाते हैं। पर आम जनता की हमदर्दी मुल्ला के साथ रहती है। मुल्ला के ऊपर तीन हजार तंके इनाम की घोषणा सुनकर सूदखोर जाफर एक बार फिर मुल्ला से बदला लेने की योजना बनाने लगता है। वह महल की तरफ निकल पड़ता है। वह बहुत देर तक महल का फाटक खटखटाता रहता है। अब आगे पढ़िए...।
सूदखोर की चुगली
फाटक बंद रहे। पहरेदार ने सुना ही नहीं, क्योंकि वे सब नसरुद्दीन को पकड़ने की तरकीबों पर गर्मागर्म बहस कर रहे थे।
निराश होकर जाफ़र चिल्लाया,‘ऐ बहादुर सिपाहियों, क्या तुम सो रहे हो?’ उसने फाटक में लगा लोहे का बेड़ा खटखटाया। काफ़ी देर के बाद किसी के क़दमों की आहट सुनाई दी। फिर साँकल के खटखटाने की आवाज़ के साथ ही लकड़ी का छोटा फाटक खुल गया। सूदख़ोर ने जल्दी से कहा, ‘अमीर से फरमाइए कि मैं उनका ग़म दूर करने आया हूँ।’
अमीर ने उसे बुलाया। लेकिन नाराज़गी के साथ कहा, जाफर, ‘अगर तुम्हारी ख़बर से मेरे दिल को खुशी नहीं हुई तो तुम्हें दो सौ बेतों की सज़ा मिलेगी।’
‘शहंशाहे-आलम, आपके इस नाचीज़ गुलाम को मालूम है कि हमारे शहर में एक ऐसी लड़की है, जिसकी खूबसूरती की मिसाल इस शहर क्या पूरी सल्तनत में नहीं मिलेगी।’
अमीर उठकर बैठ गए और सिर उठाकर उसकी ओर देखने लगे। हिम्मत पाकर सूदख़ोर बोला, ‘मेरे आका, उसकी ख़ूबसूरती का बयान करने के काबिल मेरे पास लफ्ज़ नहीं हैं। लंबा क़द है, नाज़ुक है, सुगढ़ बदन है। उसका माथा चमकदार है, गाल दमिश्की हैं। आँखें हिरनी जैसी हैं। भौंहे दूज के चाँद जैसी है। उसका मुँह हजरत सुलेमान की अँगूठी जैसा है। होठ याकूत जैसे हैं। दाँत मोतियों जैसे हैं। उसका सीना? आय हाय! जैसे संगमरमर तराश कर उस पर दो लाल चेरी नक्श कर दी गई हों। उसके कंधे-।’
अमीर ने उसे रोककर कहा, ‘अगर वह ऐसी ही है जैसी तुम बता रहे हो तो वह हमारे हरम के काबिल है। कौन है वह?’
‘मेरे आका, वह नीच ख़ानदान की है। एक कुम्हार की बेटी है। डर से मैं उस कुम्हार का नाम लेने की भी हिम्मत नहीं कर सकता कि कहीं मेरे शहंशाह के कानों की बेइज्ज़ती न हो जाए। मैं उसका घर बता सकता हूँ। लेकिन इस वफ़ादार गुलाम को क्या कोई इनाम मिलेगा?’
अमीर ने बख़्तियार को इशारा किया। एक थैली सूदख़ोर के पैरों के पास आ गिरी, जिसे उसने लालच भरी फुर्ती से लपक लिया। “अगर वह ठीक ऐसी ही हुई तो तुम्हें इतनी ही रक़म और मिलेगी।’ अमीर ने कहा। ‘लेकिन हुज़ूर ज़रा जल्दी कीजिए। मुझे मालूम है कि उस नाजु़क हिरनी का पीछा किया जा रहा है।’ अमीर की भौहें मिल गईं। नाक पर सलवटें पड़ गईं। ‘कौन कर रहा है उसकी पीछा?’ ‘नसरुद्दीन’ ‘फिर नसरुद्दीन? इसमें भी नसरुद्दीन? हर जगह नसरुद्दीन?’ अमीर ने कहा और फिर वज़ीरों की ओर मुड़कर कहने लगे, ‘तुम लोग माबदौलत की बेइज्ज़ती के सिवा कुछ नहीं कर सकते। अर्सला बेग, तुम खु़द जाओ। वह लड़की फौरन हमारे हरम में आ जानी चाहिए। अगर तुम नाकाम लौटे तो तुम्हें जल्लाद के हवाले कर दिया जाएगा।’
थोड़ी देर बाद ही सिपाहियों की एक बड़ी टुकड़ी महल के फाटक से निकली। उनके हथियार खड़क रहे थे। ढालें सूरज की रोशनी में चमक रही थीं। आगे-आगे अर्सला बेग चल रहा था और सिपाहियों के साथ बहुत ही बेढंगेपन से लँगड़ाता-घिसटता सूदख़ोर चला जा रहा था।
क्रमशः---
अगली बार पढ़िए, अमीर के हुक्म पर अर्सलाबेग अपने सिपाहियों के साथ नयाज़ के घर पहुंचता है। बदकिस्मती से नयाज़ के यहां उस समय मुल्ला नसरुद्दीन भी मौजूद होता है, फिर क्या होता है...।
(साभारः मुल्ला नसरुद्दीन, डायमंड प्रकाशन, सर्वाधिकार सुरक्षित।)
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14 फरवरी 2012
Jul 09, 2009
Aage ki story kab likhoge. Badi mazedar hai yeh story....Pls jaldi se puri kar do..........
Kashmir Thakur Baddi
Jul 02, 2009
I dont think this story has any end. Instead going for these comments we should know the purpose of this story. This story tells the purpose of life. I have been listening /reading this story for the last 50 years and always dicover a new thing in it. This story is just like the gulista of shekh saadi, always inspiring. Josh18 team is doing appreciable work.Inspiring. Josh18 team is doing appreciable work.
Er. K.D.Rai DELHI
Jul 01, 2009
Es kahani ko thoda thoda likne ki bajaye ek sath hi likh do......Thoda -2 padne me aanand nahi aata hai.........
Kashmir Thakur Himachal
Jun 30, 2009
Please publish these stories on daily or at least weekly basis. Its difficult to wait for 3 months. Please consider
Khushwant Singh bangalore
Jun 30, 2009
Yar bhai roj likha kero ise ek month ke bad kyun changer kerte ho.Nahi to iski jagah bhi news dal diya kero kam se kam change to ho jati hain
name seher
Jun 30, 2009
संपादक महोदय आप इस किस्से को हनुमान की पूंछ क्यो बना रहे है इस किस्से दैनिक नही तो साप्ताहिक प्रकाशित कर सकते है क्यो महीने दो महीने का इंतज़ार करवाते है इसे दैनिक कर दै तो पाठको को अच्छा लगेगा और तुम्हे दुआ भी देंगे इस निवेदन को आप स्वीकार करे
kamal sharma new delhi
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