14 अक्टूबर 2008
व्यंग्य
जुगनू शारदेय
सरकार का क्या कहना। एक साथ न जाने कितने मोर्चों पर जूझ रही है। इतना संघर्ष तो मुंबई में उपनगरीय रेल से चलने वाला भी नहीं करता। ना ही इतनी लड़ाई दिल्ली में ट्रैफिक से करनी पड़ती है।
दिल्ली में तो ब्लू लाइन और मोटरबाइक सवार से तो बच भी सकते हैं। ट्रैफिक से कहां बचेंगे। ट्रैफिक ही तो राष्ट्रीय अनेकता परिषद है। यह सरकारी भी नहीं है कि तीन साल में एक बार हो जाता है– दिखावे के लिए।
यह तो जनता का है। तीन सौ पैंसठ दिन,चौबीसो घंटे चलता है। राष्ट्रीय अनेकता परिषद कन्याकुमारी से कश्मीर एक है जैसा नारा है। एकता तो फ्लॉप फिल्मों जैसा द्रोण बेचारा है।
इसे संविधान नामक न पढ़ी जाने वाली घिसी पिटी काले अक्षर भैंस बराबर किताब का सहारा है। यह संविधान बड़े काम की चीज है। इसे हिंसा से सख्त नफरत है। यह गाना भी है मजहब नहीं सिखाता आपस में वैर रखना।
संविधान की सगीञसी सौतेली बहन है राजनीति। सिखाती है मजहब का काम ही है आपस में वैर रखना। कहा भी गया है कि नफरत प्यार की पहली सीढ़ी है। ना-ना करते प्यार तुम्हीं से कर बैठे..
...नेता भी गाता है, करना था इनकार मगर इकरार तुम्ही से कर बैठे। वोट दर्शन के अलावा नेता में किसी किस्म का एका नहीं होता। नेता होता ही है अनेकता। सेक्यूलर होता है, दूसरा नॉन सेक्यूलर होता है।
कभी-कभी ही नहीं अकसर नॉन सेक्यूलर भी सेक्यूलर हो जाता है। इसका उलटा भी होता है कि सेक्यूलर नॉन सेक्यूलर हो जाता है। असल में यह नेतोचित गुण है। गिरगिट की तरह रंग बदलने वाली कहावत का जन्मदाता है।
यह आम को इमली बना सकता है। यह ऊंट को पहाड़ पर चढ़ा सकता है। समस्या को लटका सकता है। कुछ करे ना करे बिना बोले बतिया सकता है। राष्ट्रीय एकता परिषद को राष्टीय अनेकता परिषद बना सकता है।
यह अतुल्य भारत है। अतुल्य भारत का नारा है अनेकता में एकता। इसे सूखा में बाढ़ दिखता है। बाढ़ में व्यापार दिखता है। व्यापार में बाजार दिखता है। एकता भी इसके लिए है वोट बाजार।
वोट बाजार में धर्म भी बिकता है। जाति भी बिकती है। यहां हमारा सड़ा बैंगन तुम्हारे कीड़े भरे बैंगन से बेहतर होता है। यहां एक का आतंकवाद दूसरे के लिए लॉ एंड आर्डर हो जाता है।
यह हंसुआ के बियाह में खुरपी का गीत नहीं गाता। यह तो बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना हो जाता है। ये मेरा दीवानापन या सत्ता का सरुर–कोई जाने या न जाने वोटर जानेगा जरूर।
इसे चिंता बहुत होती है। कहते हैं कि चिंता से चतुराई घटती है। इसकी बढ़ जाती है। दुख से घटता नहीं शरीर,वोट बढ़ जाता है। इसीलिए यह कहलाता है राष्ट्रीय अनेकता परिषद।
व्यंग्य
जुगनू शारदेय
सरकार का क्या कहना। एक साथ न जाने कितने मोर्चों पर जूझ रही है। इतना संघर्ष तो मुंबई में उपनगरीय रेल से चलने वाला भी नहीं करता। ना ही इतनी लड़ाई दिल्ली में ट्रैफिक से करनी पड़ती है।
दिल्ली में तो ब्लू लाइन और मोटरबाइक सवार से तो बच भी सकते हैं। ट्रैफिक से कहां बचेंगे। ट्रैफिक ही तो राष्ट्रीय अनेकता परिषद है। यह सरकारी भी नहीं है कि तीन साल में एक बार हो जाता है– दिखावे के लिए।
यह तो जनता का है। तीन सौ पैंसठ दिन,चौबीसो घंटे चलता है। राष्ट्रीय अनेकता परिषद कन्याकुमारी से कश्मीर एक है जैसा नारा है। एकता तो फ्लॉप फिल्मों जैसा द्रोण बेचारा है।
इसे संविधान नामक न पढ़ी जाने वाली घिसी पिटी काले अक्षर भैंस बराबर किताब का सहारा है। यह संविधान बड़े काम की चीज है। इसे हिंसा से सख्त नफरत है। यह गाना भी है मजहब नहीं सिखाता आपस में वैर रखना।
संविधान की सगीञसी सौतेली बहन है राजनीति। सिखाती है मजहब का काम ही है आपस में वैर रखना। कहा भी गया है कि नफरत प्यार की पहली सीढ़ी है। ना-ना करते प्यार तुम्हीं से कर बैठे..
...नेता भी गाता है, करना था इनकार मगर इकरार तुम्ही से कर बैठे। वोट दर्शन के अलावा नेता में किसी किस्म का एका नहीं होता। नेता होता ही है अनेकता। सेक्यूलर होता है, दूसरा नॉन सेक्यूलर होता है।
कभी-कभी ही नहीं अकसर नॉन सेक्यूलर भी सेक्यूलर हो जाता है। इसका उलटा भी होता है कि सेक्यूलर नॉन सेक्यूलर हो जाता है। असल में यह नेतोचित गुण है। गिरगिट की तरह रंग बदलने वाली कहावत का जन्मदाता है।
यह आम को इमली बना सकता है। यह ऊंट को पहाड़ पर चढ़ा सकता है। समस्या को लटका सकता है। कुछ करे ना करे बिना बोले बतिया सकता है। राष्ट्रीय एकता परिषद को राष्टीय अनेकता परिषद बना सकता है।
यह अतुल्य भारत है। अतुल्य भारत का नारा है अनेकता में एकता। इसे सूखा में बाढ़ दिखता है। बाढ़ में व्यापार दिखता है। व्यापार में बाजार दिखता है। एकता भी इसके लिए है वोट बाजार।
वोट बाजार में धर्म भी बिकता है। जाति भी बिकती है। यहां हमारा सड़ा बैंगन तुम्हारे कीड़े भरे बैंगन से बेहतर होता है। यहां एक का आतंकवाद दूसरे के लिए लॉ एंड आर्डर हो जाता है।
यह हंसुआ के बियाह में खुरपी का गीत नहीं गाता। यह तो बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना हो जाता है। ये मेरा दीवानापन या सत्ता का सरुर–कोई जाने या न जाने वोटर जानेगा जरूर।
इसे चिंता बहुत होती है। कहते हैं कि चिंता से चतुराई घटती है। इसकी बढ़ जाती है। दुख से घटता नहीं शरीर,वोट बढ़ जाता है। इसीलिए यह कहलाता है राष्ट्रीय अनेकता परिषद।
यह खबर आपको कैसी लगी
10 में से 0 वोट मिले
सम्बंधित ख़बरे -
हास्य-व्यंग्य
प्रमुख ख़बरें
- सम्मान की जंग नहीं जीत सके सेना प्रमुख
- मालदीव संकट के समाधान के लिए भारत आगे आया
- बटला की तस्वीरें देखकर रो पड़ी थीं सोनिया: खुर्शीद
- यूरोप: ठंड से 450 की मौत, जीवनरेखा डेन्यूब भी जम गई
- सेना प्रमुख हार गए ‘उम्र विवाद’ की जंग!
- सर्वोच्च न्यायालय में सरकार झुकी, आदेश से पीछे हटी
- भारत की एकता, सम्प्रभुता पर था 26/11 हमला: न्यायालय
- सिमी के खिलाफ और दो साल का प्रतिबंध
- सीरिया: अस्पताल में बिजली न होने से 18 नवजातों की मौत
- मालदीव: पूर्व राष्ट्रपति नाशीद के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट
आज के वीडियो
ख़बरें
सबसे ज्यादा पाठकों की राय
तस्वीरें
क्रिकेट समाचार
Live TV | Stock Market India | IBNLive News | IBNKhabar Hindi News | Cricket News | In.com | हमारे बारे में | हमारा पता | हमें बताइए | विज्ञापन | अस्वीकरण | गोपनीयता | शर्तें | साइट जानकारी
© 2011, Web18 Software Services Ltd. All Rights Reserved.






















