17 जून 2008
व्यंग्य
जुगनू शारदेय
यह एक अजीब सा खेल है फुटबॉल। एक मायने में यह भारतीय परंपरा के खिलाफ भी है। हम भारतीय तो पैर छूने के संस्कार वाले लोग हैं। यह भी कोई खेल है जिसमें गेंद को पैरों से मारा जाए। इसीलिए यह खेल भारत में इज्जत नहीं पाता।
अब हम यह क्यों कहें कि भारत में, क्रिकेट को छोड़ कर कोई भी खेल सम्मान नहीं पाता। जिस खेल में बार-बार गेंद को लात मारी जाए तो उसे सम्मान क्यों दें। फुटबॉल भी, ऐसा इतिहासकार मानते हैं कि 12 वीं सदी में उस वक्त के इंग्लैंड में ही शुरु हुआ था।
ऐसा लगता है कि इंग्लैंड के लोगों के पास उस वक्त भी कोई कामकाज नहीं होता था। बस खेलते ही रहते थे। जहां जहां उनका राजपाट बना, वहां-वहां उन्होंने गुलामी के खेल के साथ तरह तरह के खेल भी खेले।
जनता फुटबॉल खेलने लगी। जरा आसान था यह खेल। बस एक मैदान, एक गेंद और बाइस लोग। उधर बड़े लोग क्रिकेट खेलते थे। चूंकि इसे बड़े लोग खेलते थे, इसलिए आजादी के बाद हमने इसे ही जनता का खेल बना दिया। आज जिसे देखो क्रिकेट खेल रहा है भारत में।
दुनिया भारत से थोड़ी अलग है। दुनिया क्रिकेट नहीं खेलती। वह आज भी फुटबॉल खेलती है। अभी भी यूरोप के लोग फुटबॉल खेल रहे हैं। अंग्रेजों की गुलामी में रहे देश ही गुलामी की याद में क्रिकेट खेलते रहते हैं।
हम भारत के लोग इस लिए खेलते हैं कि सामंतवादियों को बता सकें कि देखो हमने इसे जनता का खेल बनाया। अंग्रेजों ने दुनिया के बहुत सारे देशों को गुलाम बना कर कारोबार का खेल सिखाया। हमने आजादी के बाद क्रिकेट को ही कारोबार बनाया।
क्रिकेट करोड़पति बनाता है। फुटबॉल कड़का बनाता है। इसलिए भारत इसे खेल योग्य मानता भी नहीं। सरकार इसलिए भी कर सकती है कि सरकार ने खेल को विकास भी माना है। अपने देश में सबसे बड़ा खेल ही विकास का ही है। देखिए न कॉमनवेल्थ खेल के बहाने देश की राजधानी दिल्ली का कितना विकास हो रहा है।
एक बार 1982 में भी दिल्ली में एशियाड हुआ था। एशियाड हुआ तो रंगीन टेलीविजन आया। टेलीविजन रंगीन हुआ और क्रिकेट इतना हसीन हुआ कि अब उसे चीयर्स लीडर की जरूरत पड़ती है।
फुटबॉल बेचारा गरीब ही रहा। 1951 में हुए एशियाड में इसने स्वर्ण पदक पाया था। अब कुछ नहीं पाता है। इसके खिलाड़ियों को फुटबॉल फेडरेशन प्रति फुटबॉलर 450 रुपया रोज दे कर समझाता है कि होटलाओ– खाओ– खेलो।
इसके खिलाड़ी सादगी और संस्कार की पहचान हैं। खेलते भी हैं और अपना खाना भी रोज बना कर साबित करते हैं कि कैसे फिजूलखर्ची कम की जा सकती है। बीच -बीच में अपना कपड़ा भी धो लेते हैं। कपड़ा धोना बहुत बढ़िया अभ्यास है।
फुटबॉल के लाल यह भी साबित कर देते हैं कि कन्याकुमारी से कश्मीर तक भारत एक है। अभी श्रीनगर में संतोष ट्राफी खेल लिया फुटबॉलरों ने। फिर भी वह किंग ऑफ गुड टाइम्स नहीं होते।
इसीलिए फुटबॉलर फेडरेशन ने भी तय कर ही लिया है कि फुटबॉल के लाल, नहीं है तुम में क्रिकेट का कमाल। पहले दिखाओ कुछ कमाल, फिर मिलेगा कुछ चिल्लर जैसा माल।
वाह रे वाह फुटबॉल के लाल!
व्यंग्य
जुगनू शारदेय
यह एक अजीब सा खेल है फुटबॉल। एक मायने में यह भारतीय परंपरा के खिलाफ भी है। हम भारतीय तो पैर छूने के संस्कार वाले लोग हैं। यह भी कोई खेल है जिसमें गेंद को पैरों से मारा जाए। इसीलिए यह खेल भारत में इज्जत नहीं पाता।
अब हम यह क्यों कहें कि भारत में, क्रिकेट को छोड़ कर कोई भी खेल सम्मान नहीं पाता। जिस खेल में बार-बार गेंद को लात मारी जाए तो उसे सम्मान क्यों दें। फुटबॉल भी, ऐसा इतिहासकार मानते हैं कि 12 वीं सदी में उस वक्त के इंग्लैंड में ही शुरु हुआ था।
ऐसा लगता है कि इंग्लैंड के लोगों के पास उस वक्त भी कोई कामकाज नहीं होता था। बस खेलते ही रहते थे। जहां जहां उनका राजपाट बना, वहां-वहां उन्होंने गुलामी के खेल के साथ तरह तरह के खेल भी खेले।
जनता फुटबॉल खेलने लगी। जरा आसान था यह खेल। बस एक मैदान, एक गेंद और बाइस लोग। उधर बड़े लोग क्रिकेट खेलते थे। चूंकि इसे बड़े लोग खेलते थे, इसलिए आजादी के बाद हमने इसे ही जनता का खेल बना दिया। आज जिसे देखो क्रिकेट खेल रहा है भारत में।
दुनिया भारत से थोड़ी अलग है। दुनिया क्रिकेट नहीं खेलती। वह आज भी फुटबॉल खेलती है। अभी भी यूरोप के लोग फुटबॉल खेल रहे हैं। अंग्रेजों की गुलामी में रहे देश ही गुलामी की याद में क्रिकेट खेलते रहते हैं।
हम भारत के लोग इस लिए खेलते हैं कि सामंतवादियों को बता सकें कि देखो हमने इसे जनता का खेल बनाया। अंग्रेजों ने दुनिया के बहुत सारे देशों को गुलाम बना कर कारोबार का खेल सिखाया। हमने आजादी के बाद क्रिकेट को ही कारोबार बनाया।
क्रिकेट करोड़पति बनाता है। फुटबॉल कड़का बनाता है। इसलिए भारत इसे खेल योग्य मानता भी नहीं। सरकार इसलिए भी कर सकती है कि सरकार ने खेल को विकास भी माना है। अपने देश में सबसे बड़ा खेल ही विकास का ही है। देखिए न कॉमनवेल्थ खेल के बहाने देश की राजधानी दिल्ली का कितना विकास हो रहा है।
एक बार 1982 में भी दिल्ली में एशियाड हुआ था। एशियाड हुआ तो रंगीन टेलीविजन आया। टेलीविजन रंगीन हुआ और क्रिकेट इतना हसीन हुआ कि अब उसे चीयर्स लीडर की जरूरत पड़ती है।
फुटबॉल बेचारा गरीब ही रहा। 1951 में हुए एशियाड में इसने स्वर्ण पदक पाया था। अब कुछ नहीं पाता है। इसके खिलाड़ियों को फुटबॉल फेडरेशन प्रति फुटबॉलर 450 रुपया रोज दे कर समझाता है कि होटलाओ– खाओ– खेलो।
इसके खिलाड़ी सादगी और संस्कार की पहचान हैं। खेलते भी हैं और अपना खाना भी रोज बना कर साबित करते हैं कि कैसे फिजूलखर्ची कम की जा सकती है। बीच -बीच में अपना कपड़ा भी धो लेते हैं। कपड़ा धोना बहुत बढ़िया अभ्यास है।
फुटबॉल के लाल यह भी साबित कर देते हैं कि कन्याकुमारी से कश्मीर तक भारत एक है। अभी श्रीनगर में संतोष ट्राफी खेल लिया फुटबॉलरों ने। फिर भी वह किंग ऑफ गुड टाइम्स नहीं होते।
इसीलिए फुटबॉलर फेडरेशन ने भी तय कर ही लिया है कि फुटबॉल के लाल, नहीं है तुम में क्रिकेट का कमाल। पहले दिखाओ कुछ कमाल, फिर मिलेगा कुछ चिल्लर जैसा माल।
वाह रे वाह फुटबॉल के लाल!
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