22 जून 2009
वार्ता
नई दिल्ली। उद्योग मंडल फिक्की का कहना है कि भारतीय कम्पनियां वैश्विक मंदी से बुरी तरह आहत यूरोपीय बाजार में अगले 6 से 12 माह के दौरान अधिग्रहण के रूप में बड़ा निवेश करने की इच्छुक हैं।
‘वैश्विक मंदी के दौर में यूरोपीय देशों में भारतीय निवेशकों पर प्रभाव’ विषय पर कराए गए फिक्की के एक सर्वेक्षण के अनुसार यह सम्भव है कि चालू वित्त वर्ष में यूरोपीय बाजार में भारतीय निवेश 2008 के निवेश की तुलना में कम रहेगा लेकिन निवेशकों का उत्साह कम नहीं होगा। पिछले वित्त वर्ष में यूरोप में भारतीय निवेशकों ने 2.8 अरब यूरो का निवेश किया था।
ब्रिटेन में निवेश में भारत दूसरे स्थान पर
फिक्की ने यह सर्वेक्षण उन कम्पनियों के बीच किया है जिन्होंने पहले यूरोपीय बाजार में निवेश किया है। इन कम्पनियों ने खासकर वाहन, वाहन कलपुर्जे, ऊर्जा, विनिर्माण, रसायन, सूचना तकनीक आदि क्षेत्र में निवेश किया है। सर्वेक्षण में शामिल 40 प्रतिशत कम्पनियों ने कहा है कि वे यूरोपीय देशों में निवेश के लिए तैयार हैं। इन कम्पनियों का कहना है कि अगले छह से 12 माह के दौरान वे निवेश करने के इच्छुक हैं।
इनमें से ज्यादातर कम्पनियों का कहना है कि निवेश पहले की तुलना में कम हो सकता है। उनका कहना है कि आर्थिक मंदी जैसे कई कारणों से वे यूरोपीय बाजार में बड़ा निवेश नहीं कर रही हैं।
विदेशी विमान कम्पनियां आ सकेंगी भारत
फिक्की के सर्वेक्षण के अनुसार भारतीय कम्पनियां यूरोपीय बाजार में आर्थिक मंदी के कारण बड़ा निवेश करने से डर रही हैं इसके बावजूद उनके भीतर अब भी यूरोपीय बाजार के प्रति विश्वास बना हुआ है जिसके कारण पहले यूरोपीय बाजार में निवेश कर चुकी भारतीय कम्पनियां वहां निवेश करने की इच्छुक हैं। इन कम्पनियों का कहना है कि वह वैश्विक स्तर पर छाई वित्तीय स्थिति को देखते हुए निवेश करने से संकोच कर रही हैं।
यूरोपीय बाजार में अधिग्रहण करने वाली 60 प्रतिशत कम्पनियों ने कहा कि उन्हें निवेश से फायदा हुआ है। इन्हीं कुछ कारणों को देखते हुए भारतीय कम्पनियां यूरोपीय बाजार में मंदी के दौर के बावजूद निवेश की इच्छुक हैं। इनमें से अधिकतर कम्पनियों का कहना है कि वर्तमान परिदृश्य में वे निवेश में सतर्कता जरूर बरतना चाहते हैं।
स्वच्छ ऊर्जा में विकासशील देशों का निवेश बढ़ा
भारतीय कम्पनियों ने 2007 में सबसे अधिक यूरोपीय कम्पनियों का अधिग्रहण किया है। उस दौर में 9.5 अरब यूरो का अधिग्रहण किया गया। इसके बाद में इसमें गिरावट आई और 2008 में यह दर सिर्फ 2.4 अरब यूरो रही। सर्वेक्षण के अनुसार 2009 में इस दर में और कमी आ सकती है।
वार्ता
नई दिल्ली। उद्योग मंडल फिक्की का कहना है कि भारतीय कम्पनियां वैश्विक मंदी से बुरी तरह आहत यूरोपीय बाजार में अगले 6 से 12 माह के दौरान अधिग्रहण के रूप में बड़ा निवेश करने की इच्छुक हैं।
‘वैश्विक मंदी के दौर में यूरोपीय देशों में भारतीय निवेशकों पर प्रभाव’ विषय पर कराए गए फिक्की के एक सर्वेक्षण के अनुसार यह सम्भव है कि चालू वित्त वर्ष में यूरोपीय बाजार में भारतीय निवेश 2008 के निवेश की तुलना में कम रहेगा लेकिन निवेशकों का उत्साह कम नहीं होगा। पिछले वित्त वर्ष में यूरोप में भारतीय निवेशकों ने 2.8 अरब यूरो का निवेश किया था।
ब्रिटेन में निवेश में भारत दूसरे स्थान पर
फिक्की ने यह सर्वेक्षण उन कम्पनियों के बीच किया है जिन्होंने पहले यूरोपीय बाजार में निवेश किया है। इन कम्पनियों ने खासकर वाहन, वाहन कलपुर्जे, ऊर्जा, विनिर्माण, रसायन, सूचना तकनीक आदि क्षेत्र में निवेश किया है। सर्वेक्षण में शामिल 40 प्रतिशत कम्पनियों ने कहा है कि वे यूरोपीय देशों में निवेश के लिए तैयार हैं। इन कम्पनियों का कहना है कि अगले छह से 12 माह के दौरान वे निवेश करने के इच्छुक हैं।
इनमें से ज्यादातर कम्पनियों का कहना है कि निवेश पहले की तुलना में कम हो सकता है। उनका कहना है कि आर्थिक मंदी जैसे कई कारणों से वे यूरोपीय बाजार में बड़ा निवेश नहीं कर रही हैं।
विदेशी विमान कम्पनियां आ सकेंगी भारत
फिक्की के सर्वेक्षण के अनुसार भारतीय कम्पनियां यूरोपीय बाजार में आर्थिक मंदी के कारण बड़ा निवेश करने से डर रही हैं इसके बावजूद उनके भीतर अब भी यूरोपीय बाजार के प्रति विश्वास बना हुआ है जिसके कारण पहले यूरोपीय बाजार में निवेश कर चुकी भारतीय कम्पनियां वहां निवेश करने की इच्छुक हैं। इन कम्पनियों का कहना है कि वह वैश्विक स्तर पर छाई वित्तीय स्थिति को देखते हुए निवेश करने से संकोच कर रही हैं।
यूरोपीय बाजार में अधिग्रहण करने वाली 60 प्रतिशत कम्पनियों ने कहा कि उन्हें निवेश से फायदा हुआ है। इन्हीं कुछ कारणों को देखते हुए भारतीय कम्पनियां यूरोपीय बाजार में मंदी के दौर के बावजूद निवेश की इच्छुक हैं। इनमें से अधिकतर कम्पनियों का कहना है कि वर्तमान परिदृश्य में वे निवेश में सतर्कता जरूर बरतना चाहते हैं।
स्वच्छ ऊर्जा में विकासशील देशों का निवेश बढ़ा
भारतीय कम्पनियों ने 2007 में सबसे अधिक यूरोपीय कम्पनियों का अधिग्रहण किया है। उस दौर में 9.5 अरब यूरो का अधिग्रहण किया गया। इसके बाद में इसमें गिरावट आई और 2008 में यह दर सिर्फ 2.4 अरब यूरो रही। सर्वेक्षण के अनुसार 2009 में इस दर में और कमी आ सकती है।
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