03 जुलाई 2009
वार्ता
जोधपुर। केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान ‘काजरी’ के वैज्ञानिकों ने खाड़ी देशों के उत्तम किस्म के खजूर के पौधे सूक्ष्म उत्तक प्रवर्धन तकनीक टिश्यू कल्चर से तैयार करने में सफलता हासिल की है।
काजरी के निदेशक डॉ.के.पी.आर.विट्ठल ने बताया कि इस तकनीक से पौधे तैयार करने से लेकर उसके फल लगने तक के सभी परीक्षण किए जा चुके हैं। रेगिस्तान की जलवायु एवं मिट्टी में पनपने एवं सबसे लाभदायक किस्मों की पहचान भी की जा चुकी है।
पढ़ें: राजस्थान में उगेंगे अरब के खजूर
उन्होंने कहा कि खाड़ी देशों में इसकी व्यावसायिक फसल की जाती है। भारत में इसकी फसल गुजरात के कच्छ, भूज, मांडवी एवं पंजाब के अबोहर जिले में की जाती है।
उन्होंने बताया कि यहां काजरी में अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना शुष्क क्षेत्रफल के तहत वर्ष 1978 में खजूर पर कार्य शुरू किया गया था और इस परियोजना में 18 विभिन्न किस्में मूल्यांकन के लिए काजरी के जोधपुर एवं जैसलमेर अनुसंधान फार्मों में लगाई गई थी।
उन्होंने कहा कि यह सभी किस्में विदेशों से लाई गई थी। इनमें से चार-पांच किस्में यहां की जलवायु एवं वर्षा की स्थिति को देखते हुए उपयुक्त पाई गई है।
पढ़ें: म.प्र: हरा-भरा होगा हरियाली महोत्सव
उन्होंने बताया कि उपयुक्त किस्मों में हलावी, बरही, मस्कटदो खुनेजी एवं हयानी शामिल है लेकिन इसमें मस्कट दो सबसे उत्तम है क्योंकि इसका फल डोका अवस्था में ही खाने लायक हो जाता है तथा जून में ही डोका आ जाते है। इसका रंग भी लाल रहता है एवं इसमें मिठास की मात्रा भी 40 से 50 प्रतिशत हो जाती है।
उन्होंने बताया कि अन्य किस्मों में फल इस अवस्था में पीले रंग के होते है। इन किस्मों के अलावा खजूर की शेष किस्मों में फल डोका में खाने में कसैलापन युक्त होते हैं।
उन्होंने कहा कि डोका अवस्था में ही इसका फल तोड़ना उपयुक्त होता है क्योंकि यहां जुलाई एवं अगस्त में बरसात आने पर फल गल-सड़कर खराब हो जाता है। उन्होंने बताया कि इनमें मस्कट दो किस्म डोका अवस्था में सबसे पहले आती है तथा यह स्वादिष्ट एवं मीठी भी अधिक है।
उन्होंने कहा कि परम्परागत तरीकों बीजों से तैयार पौधों में नर एवं मादा दोनों सम्मिलित होते है और फल मादा पर ही आते है लेकिन टिश्यू कल्चर से तैयार पौधे मादा ही होते है तथा इनकी खेती के लिए केवल 10 प्रतिशत ही नर पौधे रोपे जाते हैं जिनसे परागण लेकर मादा पौधों पर छिड़काव किया जाता है। खजूर के व्यावसायिक खेती के लिए टिश्यू कल्चर से तैयार पौधा सबसे उपयुक्त होता है।
डॉ.सुरेश कुमार ने बताया कि राजस्थान के जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, जोधपुर, नागौर सीकर, चुरु एवं गंगानगर जिले के कुछ हिस्सों में इसकी खेती की जा सकती है। उन्होंने कहा कि राज्य में दो से तीन लाख हैक्टेयर क्षेत्र में प्रभावी रूप से खजूर की खेती हो सकती है।
पढ़ें: म.प्र: 3,000 गांव होंगे बायो-गैस युक्त
इसमें ऐसे क्षेत्र भी शामिल है जो बहुत अधिक लवणीय या अन्य फसलों के उपयुक्त नहीं है। उन्होंने कहा कि लवणीय मृदा में पीएच मान साढे़ आठ तक हो उसमें भी खजूर की खेती सम्भव है।
उन्होंने कहा कि यह शुष्क जलवायु में पनपने वाला बहुत महत्वपूर्ण फल है तथा पामेसी परिवार से संबंध रखने वाले इस फलदार पेड़ का वानस्पतिक नाक फोनिक्स डेक्टीलीफेरा है।
विश्व में इसकी खेती प्रमुख रूप से मिश्र, ईरान, इराक, सऊदी अरब, पाकिस्तान, मोरक्को, ओमान आदि देशों में की जाती है। वहां पर इसकी व्यावसायिक तौर पर इसकी खेती होती है और इसके अनेक उत्पाद बनाए जाते हैं।
टिश्यू कल्चर से तैयार करने में अहम भूमिका निभाने वाले वैज्ञानिक आर.आर बाली ने बताया कि हाल ही में राजस्थान सरकार ने इसकी खेती के विस्तार के लिए सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र की साझेदारी से एक संयुक्त प्रयास शुरू किए है।
पढ़ें: हरा होगा गुलाबी नगर
राजस्थान उद्यान विकास समिति एवं अतुल राजस्थान डेट पाम लि. के बीच एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए है और इस योजना में प्रदेश में टिश्यू कल्चर से खजूर के पौधे तैयार करना भी शामिल है।
उन्होंने बताया कि फिलहाल अरब देशों में इसी विधि से तैयार पौधे आयात कर लाए जा रहे हैं। लेकिन इनकी लागत करीब तीन हजार रुपए प्रति पौधा पड़ती है। उन्होंने बताया कि यहां इसी तकनीक से तैयार पौधे की लागत सात आठ सौ रूपए से अधिक नहीं होगी।
उन्होंने बताया कि हालांकि राज्य सरकार इस योजना के तहत किसानों को 90 प्रतिशत अनुदान पर पौधे उपलब्ध कराएगी तथा बूंद-बूंद सिंचाई संयंत्र पर भी अनुदान उपलब्ध है। अगले चरण में राज्य में टिश्यू कल्चर प्रयोगशाला स्थापित की जाएगी।
वार्ता
जोधपुर। केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान ‘काजरी’ के वैज्ञानिकों ने खाड़ी देशों के उत्तम किस्म के खजूर के पौधे सूक्ष्म उत्तक प्रवर्धन तकनीक टिश्यू कल्चर से तैयार करने में सफलता हासिल की है।
काजरी के निदेशक डॉ.के.पी.आर.विट्ठल ने बताया कि इस तकनीक से पौधे तैयार करने से लेकर उसके फल लगने तक के सभी परीक्षण किए जा चुके हैं। रेगिस्तान की जलवायु एवं मिट्टी में पनपने एवं सबसे लाभदायक किस्मों की पहचान भी की जा चुकी है।
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उन्होंने कहा कि खाड़ी देशों में इसकी व्यावसायिक फसल की जाती है। भारत में इसकी फसल गुजरात के कच्छ, भूज, मांडवी एवं पंजाब के अबोहर जिले में की जाती है।
उन्होंने बताया कि यहां काजरी में अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना शुष्क क्षेत्रफल के तहत वर्ष 1978 में खजूर पर कार्य शुरू किया गया था और इस परियोजना में 18 विभिन्न किस्में मूल्यांकन के लिए काजरी के जोधपुर एवं जैसलमेर अनुसंधान फार्मों में लगाई गई थी।
उन्होंने कहा कि यह सभी किस्में विदेशों से लाई गई थी। इनमें से चार-पांच किस्में यहां की जलवायु एवं वर्षा की स्थिति को देखते हुए उपयुक्त पाई गई है।
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उन्होंने बताया कि उपयुक्त किस्मों में हलावी, बरही, मस्कटदो खुनेजी एवं हयानी शामिल है लेकिन इसमें मस्कट दो सबसे उत्तम है क्योंकि इसका फल डोका अवस्था में ही खाने लायक हो जाता है तथा जून में ही डोका आ जाते है। इसका रंग भी लाल रहता है एवं इसमें मिठास की मात्रा भी 40 से 50 प्रतिशत हो जाती है।
उन्होंने बताया कि अन्य किस्मों में फल इस अवस्था में पीले रंग के होते है। इन किस्मों के अलावा खजूर की शेष किस्मों में फल डोका में खाने में कसैलापन युक्त होते हैं।
उन्होंने कहा कि डोका अवस्था में ही इसका फल तोड़ना उपयुक्त होता है क्योंकि यहां जुलाई एवं अगस्त में बरसात आने पर फल गल-सड़कर खराब हो जाता है। उन्होंने बताया कि इनमें मस्कट दो किस्म डोका अवस्था में सबसे पहले आती है तथा यह स्वादिष्ट एवं मीठी भी अधिक है।
उन्होंने कहा कि परम्परागत तरीकों बीजों से तैयार पौधों में नर एवं मादा दोनों सम्मिलित होते है और फल मादा पर ही आते है लेकिन टिश्यू कल्चर से तैयार पौधे मादा ही होते है तथा इनकी खेती के लिए केवल 10 प्रतिशत ही नर पौधे रोपे जाते हैं जिनसे परागण लेकर मादा पौधों पर छिड़काव किया जाता है। खजूर के व्यावसायिक खेती के लिए टिश्यू कल्चर से तैयार पौधा सबसे उपयुक्त होता है।
डॉ.सुरेश कुमार ने बताया कि राजस्थान के जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, जोधपुर, नागौर सीकर, चुरु एवं गंगानगर जिले के कुछ हिस्सों में इसकी खेती की जा सकती है। उन्होंने कहा कि राज्य में दो से तीन लाख हैक्टेयर क्षेत्र में प्रभावी रूप से खजूर की खेती हो सकती है।
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इसमें ऐसे क्षेत्र भी शामिल है जो बहुत अधिक लवणीय या अन्य फसलों के उपयुक्त नहीं है। उन्होंने कहा कि लवणीय मृदा में पीएच मान साढे़ आठ तक हो उसमें भी खजूर की खेती सम्भव है।
उन्होंने कहा कि यह शुष्क जलवायु में पनपने वाला बहुत महत्वपूर्ण फल है तथा पामेसी परिवार से संबंध रखने वाले इस फलदार पेड़ का वानस्पतिक नाक फोनिक्स डेक्टीलीफेरा है।
विश्व में इसकी खेती प्रमुख रूप से मिश्र, ईरान, इराक, सऊदी अरब, पाकिस्तान, मोरक्को, ओमान आदि देशों में की जाती है। वहां पर इसकी व्यावसायिक तौर पर इसकी खेती होती है और इसके अनेक उत्पाद बनाए जाते हैं।
टिश्यू कल्चर से तैयार करने में अहम भूमिका निभाने वाले वैज्ञानिक आर.आर बाली ने बताया कि हाल ही में राजस्थान सरकार ने इसकी खेती के विस्तार के लिए सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र की साझेदारी से एक संयुक्त प्रयास शुरू किए है।
पढ़ें: हरा होगा गुलाबी नगर
राजस्थान उद्यान विकास समिति एवं अतुल राजस्थान डेट पाम लि. के बीच एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए है और इस योजना में प्रदेश में टिश्यू कल्चर से खजूर के पौधे तैयार करना भी शामिल है।
उन्होंने बताया कि फिलहाल अरब देशों में इसी विधि से तैयार पौधे आयात कर लाए जा रहे हैं। लेकिन इनकी लागत करीब तीन हजार रुपए प्रति पौधा पड़ती है। उन्होंने बताया कि यहां इसी तकनीक से तैयार पौधे की लागत सात आठ सौ रूपए से अधिक नहीं होगी।
उन्होंने बताया कि हालांकि राज्य सरकार इस योजना के तहत किसानों को 90 प्रतिशत अनुदान पर पौधे उपलब्ध कराएगी तथा बूंद-बूंद सिंचाई संयंत्र पर भी अनुदान उपलब्ध है। अगले चरण में राज्य में टिश्यू कल्चर प्रयोगशाला स्थापित की जाएगी।
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